उत्तराखंड सरकार के 51 मंदिरों के अधिग्रहण का अधिनियम भारत के संविधान के प्रति दुस्साहसी अवहेलना है: सुब्रमण्यम स्वामी

    सुब्रमण्यम स्वामी ने मजबूती से तर्क दिया कि उत्तराखंड सरकार चार धाम अधिनियम भारतीय संविधान की दुस्साहसी अवहेलना क्यों है!

    1
    1074
    सुब्रमण्यम स्वामी ने मजबूती से तर्क दिया कि उत्तराखंड सरकार चार धाम अधिनियम भारतीय संविधान की दुस्साहसी अवहेलना क्यों है!
    सुब्रमण्यम स्वामी ने मजबूती से तर्क दिया कि उत्तराखंड सरकार चार धाम अधिनियम भारतीय संविधान की दुस्साहसी अवहेलना क्यों है!

    विवादास्पद चार धाम देवस्थानम प्रबंधन अधिनियम को भारत के संविधान की “दुस्साहसी अवहेलना” करार देते हुए, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने उत्तराखंड उच्च न्यायालय में अपने अंतिम तर्क में कहा कि राज्य सरकार ने बुनियादी सिद्धांतों का पूरी तरह से उल्लंघन किया है और केदारनाथ और बद्रीनाथ सहित 51 मंदिरों के अधिग्रहण अधिनियम को खत्म किया जाना चाहिए। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से घंटे भर से अधिक समय तक बहस करते हुए, स्वामी ने कहा कि अधिनियम पूरी तरह से अधिकारातीत है और भारत में कहीं भी ऐसी चीजें नहीं हुई हैं, जहां राज्य सरकार “बस गयी और मंदिरों को हड़प लिया”।

    मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन और न्यायमूर्ति रमेश चंद्र खुल्बे की खंडपीठ के समक्ष दलील देते हुए, स्वामी ने तमिलनाडु में मंदिर अधिग्रहण के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय का हवाला दिया और कहा कि उत्तराखंड सरकार को मंदिरों में भ्रष्टाचार के बारे में कोई निष्कर्ष नहीं मिला है। वरिष्ठ अधिवक्ता मनीषा भंडारी और सत्यपॉल सभरवाल से सहायता प्राप्त स्वामी ने कहा – “उन्होंने इस अधिनियम को 2019 में पारित करने के लिए 2013 की प्राकृतिक आपदा का हवाला दिया। यह भारत के संविधान की दुस्साहसी अवहेलना है। कोई पूछताछ नहीं हुई। एक कारण के रूप में 2013 की प्राकृतिक आपदा का हवाला दिया गया… अगर मैं इसे एक ईसाई शब्द के रूप में उपयोग करूँ तो यह ईश-निन्दा है,”। न्यायालय ने मामले के फैसले को अभी सुरक्षित रखा है, जो 28 जुलाई को मुख्य न्यायाधीश रमेश रंगनाथन की सेवानिवृत्ति से पहले होने की उम्मीद है।

    इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

    स्वामी ने महाधिवक्ता के प्रश्नों पर नाराजगी जताई, जिस में स्वामी के गोत्र के बारे में पूछा गया था। राज्य के कानूनी अधिकारी ने पहले तर्क दिया कि स्वामी उत्तराखंड में मंदिरों के गोत्र या संप्रदाय से संबंधित नहीं हैं। विवादित अधिनियम का हवाला देते हुए, स्वामी ने कहा कि वह एक हिंदू होने के नाते संबंधित व्यक्ति हैं। इससे पहले भाजपा शासित राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में स्वामी द्वारा इस मामले पर ट्वीट करने पर नाराजगी जताई थी। स्वामी ने पलटवार किया कि ट्वीट ये दर्शाते हैं कि मैं इस मामले से संबंधित हूं। उन्होंने खंडपीठ को राज्य भर में जनता के गुस्से और 51 मंदिरों के अधिग्रहण अधिनियम की इस ज़बरदस्त अवैधता पर पुजारियों के विरोध प्रदर्शन के बारे में बताया।

    ऐतिहासिक निर्णयों का हवाला देते हुए स्वामी ने न्यायालय से इस अधिनियम को रद्द करने की मांग की – “भारत में कहीं भी, एक मुख्यमंत्री एक मंदिर बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में काम नहीं कर रहा है। क्यों एक धर्मनिरपेक्ष देश में सरकार धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है? मंदिरों के प्रशासन को संभालना राजनेताओं या उनके नामदारों का काम नहीं है।”

    1 COMMENT

    1. It is high time that the SANATAN DHARMA status of this spiritual land which have been spreading “expressing realisation of association with nature around” and humanity’s main duty and responsibility towards all living being as Human, irrespective of what he/she outwardly wears as their gathering together termed as RELIGION which is fractionally based on SOME OF THE FINDINGS THROUGH SPIRITUALISM THE BASIC FOUNDATION OF THOUSANDS OF YEARS OLD REALISATION OF SANATAN FINDINGS FOR ALL and duties, rights and demands including UNSPOKEN of EVERY LIVING BEING.
      In the light and matter of facts the creater of FOUNDATION, along with meny other established wisdom yet to be understood by Gatherings termed as different Associations (Religions) have to widen their base of unlimited experiance gathered under SANATAN FOR ALL and come under the unending universal roof ment for the benifit of Humanity and living being on and round planet Earth.
      Such thought provoking and thousands of years old Indian Civilization based on SANAAN SPIRITUAL FINDING is being suppressed under threat and terror of different gathering called RELIGIONS BRINGING THE UNIVERSAL STATUS, FOR SELFISH COMPARISION LIKE CHILD CHALLENGING OWN MOTHER.
      Under the circumstances the land of Universal knowledge under SANATAN way for universal existence for all be PROUDLY CONTINUED AS “SANATAN NATION and not mention the right of FOLLOWERS TO SANATAN IS FIRST AND WAY OF LIFE ADHERED TO IS TO BE ACCEPTED BY THOSE WHO DON’T CONTINUE TO BE PRODUCT OF THIS LAND OF SANATAN FINDING FAITH ESTABLISHED IN THIS LAND ND ITS NATURE AROUND. THOSE WHO ARE ASSOCIATE WITH RELIGIONS BASED ON SOME OF THE FINDINGS OF SANATAN THEY ARE, ON THEIR OWN TO WIDEN THEIR VISION AND BASE TO SPIRITUALLY PROVEN AND FINDINGS OF SANATAN AND START EXPERIENCING AND REALISING THEY ALL ARE WELCOME UNDER THE UNIVERSAL UMBRELLA OF “SANATAN FINDINGS AND SPREADING UNIVERSAL TRUTH ON THIS PLANNET FOR THE BENEFIT OF UNIVERSAL HUMANITY AND ITS OBLIGATIONS TOWAR ALL LIVING BEING TO SERVE HELP UNIVERSAL BALANCE.

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.