असभ्य लेफ्ट-लिबराटी और उनकी वेबसाइटों ने कई साहसिक फैसलों की अनदेखी कर न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की बदनामी की

यदि कोई न्यायाधीश वामपंथियों कि बात नहीं मानता, तो उनका न्याय व्यवस्था के प्रति द्वेष व्यक्त करने का सर्वोत्तम उदाहरण न्यायाधीश अरुण मिश्रा के खिलाफ चलाई गयी मुहिम है!

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यदि कोई न्यायाधीश वामपंथियों कि बात नहीं मानता, तो उनका न्याय व्यवस्था के प्रति द्वेष व्यक्त करने का सर्वोत्तम उदाहरण न्यायाधीश अरुण मिश्रा के खिलाफ चलाई गयी मुहिम है!
यदि कोई न्यायाधीश वामपंथियों कि बात नहीं मानता, तो उनका न्याय व्यवस्था के प्रति द्वेष व्यक्त करने का सर्वोत्तम उदाहरण न्यायाधीश अरुण मिश्रा के खिलाफ चलाई गयी मुहिम है!

पिछले एक हफ्ते से, कई वाम-झुकाव वाली वेबसाइटें न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के खिलाफ नकारात्मक कहानियां प्रकाशित कर रही हैं, जो 2 सितंबर को सेवानिवृत्त हुए, जबकि इन वेबसाइटों द्वारा उनके द्वारा दिए गए साहसिक फैसलों को नजरअंदाज कर दिया गया। वामपंथियों की यह असभ्य आदत है कि वे अपने विपक्षियों की छवि को मैला करते रहते हैं। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा वामपंथी नहीं हैं और एक अधिवक्ता के रूप में उनकी राजनीतिक विचारधाराएं और एक छात्र के रूप में वे दक्षिणपंथ (राइट विंग) की ओर उन्मुख रहे। लेकिन जज के रूप में, उन्होंने केरल में अवैध फ्लैटों को गिराए जाने के मामले में और टेलीकॉम एजीआर बकाया का मामला, जिससे सरकारी खजाने को 1.65 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए, जैसे शानदार और साहसिक निर्णय दिये।

गृह मंत्री अमित शाह के बेटे द्वारा दायर मानहानि मामले में द वायर जैसे लेफ्ट पोर्टल्स को न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा के प्रकोप का सामना करना पड़ा और आखिरकार वेबसाइट ने अपनी याचिका वापस ले ली। प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण और अरुण मिश्रा के बीच मेडिकल कॉलेज घोटाले पर बहस के दौरान पहली बार कोर्ट में तनातनी हुई। भूषण ने गलत तरीके से भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा को सीबीआई की प्राथमिकी में एक अभियुक्त के रूप में बुलाया और इसकी प्रतिक्रिया के रूप में उन पर 25 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया। नवीनतम, न्यायालय की अवमानना का मामला था जहाँ भूषण को दोषी पाया गया था।

न्यायमूर्ति मिश्रा जो 1999 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदस्थ हुए थे, वे भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की सेवानिवृत्ति के बाद अगस्त 2017 से भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले थे।

एक अन्य बदनामी सीपीआई(एम) नियंत्रित पोर्टल न्यूज क्लिक से हुई। उन्होंने एक लेख लिखा जिसमें कहा गया कि न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने अनुकूल निर्णय द्वारा अडानी समूह की मदद की। न्यायमूर्ति मिश्रा ने केवल बिजली दरों से संबंधित याचिका में निचली अदालतों के फैसले की पुष्टि की थी। अडानी ने सभी मंचों पर जीत हासिल की क्योंकि सरकारों ने बिजली दरों के पक्ष में कानूनों को बदल दिया था। याचिका अभियंताओं (इंजीनियरों) के एक संघ द्वारा दायर की गई थी। इसलिए, अगर न्यायमूर्ति मिश्रा इतने ही व्यवसायी-हितैषी थे, तो इन वामपंथी लेखकों ने टेलीकॉम क्षेत्र में उनके निर्णय क्यों नहीं देखे, जहां टाटा से अंबानी से लेकर बिरला तक सभी व्यवसायियों पर गाज गिरी और सरकारी खजाने को 1.65 लाख करोड़ रुपये का भुगतान करने के लिए मजबूर हुए!

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ के साहस की वजह से ही इतनी बड़ी रकम सरकारी खजाने में आई। यहां तक कि सरकार ने भी मामले में धोखाधड़ी की और 20 साल के किस्त पैकेज की अनुमति दी, जिसे अदालत ने कटौती कर 10 साल कर दिया[1]

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

वामपंथी गिरोह की तरह, पूर्व भ्रष्ट वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा से नफरत करते हैं। यह न्यायमूर्ति मिश्रा ही थे, जिन्होंने सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सीबीआई और ईडी को छह महीने में जांच खत्म करने और एयरसेल मैक्सिस घोटाले में आरोप-पत्र दाखिल करने का आदेश दिया। स्वामी ने मई 2012 में याचिका दायर की थी और मामला कई न्यायाधीशों के पास गया और आखिरकार, 2017 के अंत में पांच साल के बाद, न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की खंडपीठ ने सीबीआई को जांच खत्म करने और छह महीने के भीतर एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में आरोप-पत्र दायर करने का आदेश दिया। सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका में न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बाद दिल्ली पुलिस को 2018 में शशि थरूर के खिलाफ सुनंदा हत्या मामले में आरोप-पत्र दाखिल करने के लिए मजबूर होना पड़ा। ये घटनाएं न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की साहसिकता को दर्शाती हैं और यह भी दर्शाती हैं कि उनके शत्रु और शत्रु के सहयोगी कौन हैं!

दरअसल न्यायमूर्ति मिश्रा जो 1999 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदस्थ हुए थे, वे भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की सेवानिवृत्ति के बाद अगस्त 2017 से भारत के मुख्य न्यायाधीश बनने वाले थे। यह सर्वविदित है कि वैचारिक मतभेदों के कारण, कांग्रेस शासन के दौरान न्यायमूर्ति मिश्रा को उच्चतम न्यायालय में पदोन्नत नहीं किया गया था।

न्यायमूर्ति मिश्रा एक साहसिक न्यायाधीश हैं जो केरल में अवैध रूप से निर्मित फ्लैटों को गिराने के आदेश से स्पष्ट है, जहां सभी सरकारों ने बिल्डर मंडली को बचाने की कोशिश की। न्यायमूर्ति मिश्रा ने बाद में बताया कि फ्लैटों को गिराना “दर्दनाक कर्तव्य” था[2]

न्यायाधीश बनने से पहले, अरुण मिश्रा बार काउंसिल की गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल थे और उनका झुकाव राइट-विंग एडवोकेट्स एसोसिएशन की तरफ था। यह सर्वविदित है कि बार काउंसिल के चुनाव ज्यादातर राजनीतिक तर्ज पर लड़े जाते हैं और वामपंथी और कांग्रेस के भी अपने-अपने अधिवक्ता संघ हैं। 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक व्यक्ति का अपना राजनीतिक पक्ष है। लेकिन अपने पिछले राजनीतिक झुकाव के आधार पर एक न्यायाधीश को दोषी ठहराना बुरा और असभ्य है। वाम दलों को हमेशा यह समस्या रहती है। अगर उनके विपरीत पक्ष में से कोई भी जज बन जाता है तो वे उसकी बदनामी करने लगते हैं और यदि उनके गिरोह से कोई जज बनता है, तो वे उसकी प्रशंसा के अंबार लगा देते हैं। मिसाल के तौर पर – न्यायमूर्ति वीआर कृष्णा अय्यर जज बनने से पहले केरल के पहले कम्युनिस्ट मंत्रालय में मंत्री थे। लेकिन वामपंथियों द्वारा बनाई गई एक कथा है कि न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर अंतिम निर्णयकर्ता हैं, जबकि कई संवेदनशील मामलों में उनके कई विवादित निर्णयों को अनदेखा कर दिया जाता है जैसे कि प्रसिद्ध इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले से इंदिरा गांधी को बचाने का रास्ता देना, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय में इंदिरा के चुनाव को चुनावी दिशानिर्देशों के उल्लघन के तौर पर अवैध घोषित किया गया था। हमने हाल ही में एक न्यायाधीश द्वारा नक्सलियों को बचाने की कोशिश करते हुए देखा, जो नक्सली उनकी पत्नी के वैचारिक सहयोगी हैं। और हमने वामपंथियों को उस न्यायाधीश की बेहिसाब प्रशंसा करते देखा है।

वाम उन्नति हमेशा इस तरह से होती है। अगर आप उनकी तरफ नहीं हैं, तो बेहतर होगा कि आप बदनामी का सामना करने के लिए तैयार रहें। यह एक ज्ञात तथ्य है कि कई न्यायाधीश भी वामपंथ उन्मुख हैं। पीगुरूज ने हाल ही में अवमानना मामलों में वामपंथी और तथाकथित उदारवादी तंत्र के दोहरे चरित्र पर एक लेख प्रकाशित किया था, जब प्रशांत भूषण और राइट विंगर गुरुमूर्ति की बात आती है[3]

संदर्भ:

[1] Telecom AGR dues case: Supreme Court allows 10-year installment to pay the dues of Rs.1.43 Lakh croresSep 2, 2020, PGurus.com

[2] SC describes Maradu flats demolition as “painful duty”Jan 13, 2020, OutlookIndia.com

[3] अवमानना मामलों में भ्रष्ट लेफ्ट-लिबरल (वामपंथी-उदारवादी) तंत्र का कपट। प्रशांत भूषण के लिए रो रहा है, लेकिन गुरुमूर्ति को जेल होने की कामना करता हैAug 19, 2020, hindi.pgurus.com

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