एमसीएक्स कपास अनुबंध में चल रहे नाटक!

सेबी ने सचेत नियामक की तरह कपास की गांठ के नमूनों का परीक्षण क्यों नहीं किया जबकि बाजार में 'गुणवत्ता' का भय था?

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एमसीएक्स कपास अनुबंध में चल रहे नाटक!
एमसीएक्स कपास अनुबंध में चल रहे नाटक!

इतनी बड़ी मात्रा में कपास की गांठों का मुख्य खरीदार महीनों से डिलीवरी लेने से क्यों अनिक्षुक था और मानसून के मौसम में भी माल गोदामों में सड़ने क्यों दिया?

‘एक दोषी व्यक्ति को किसी अभियुक्त की आवश्यकता नहीं है’, यह एक पुरानी कहावत है जो मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) में हाल ही में कपास व्यापार अनुबंधों में जो कुछ सामने आया उस पर बिल्कुल सटीक बैठती है। विगत कुछ दिनों में भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड (सेबी) में प्रचंड पैतरेबाजियों को देखने के बाद पीगुरूज ने अपना लेख “कैसे सेबी ने एमसीएक्स मामलों में अपनी आँखों पर पट्टी बांध रखी है” प्रकाशित किया [1]। शीर्ष एमसीएक्स अधिकारियों को मुंबई में सेबी के मुख्यालय में भागते देखा गया था (जब तक कि उन्हें आगंतुकों पार-पत्र (विजिटर्स पास) सेबी के अंदर अनुमति नहीं दी गई थी), जो कि कपास व्यापार से जुड़ी गड़बड़ी को हल करने के लिए थे।

इन गुप्त बैठकों के बाद अब इसे सेबी और एक्सचेंज से जुड़े लोगों द्वारा घोषित किया जा रहा है कि गोदामों में पड़ी कपास की गांठों की गुणवत्ता के साथ कोई समस्या नहीं थी। क्या यह मज़े के लिए था कि कपास की इतनी बड़ी मात्रा का मुख्य खरीददार महीनों तक डिलीवरी लेने से अनिक्षुक था और मानसून के मौसम में भी माल को गोदामों में सड़ने दिया?

एमसीएक्स कॉटन कॉन्ट्रैक्ट (कपास अनुबंध) पर कारोबार करने वाले लुइस ड्रेफस (एलडी) और ग्लेनकोर दोनों ने 28 अगस्त को पहले लेख के प्रकाशन के बाद पीगुरूज को लगभग समान स्पष्टीकरण जारी किए हैं।

याद रखें, मानसून के मौसम में कपास सबसे संवेदनशील कृषि उत्पाद है क्योंकि यह चुंबक की तरह नमी को आकर्षित करता है और गुणवत्ता जल्द ही बिगड़ने लगती है। अगस्त के महीने में भी गुजरात और महाराष्ट्र के गोदामों में कपास की लाख से अधिक गांठें पड़ी हैं; कई लोगों को चकित करते हुए इन कपास गांठों के ‘हाजिर’ बाजार दाम एमसीएक्स में ‘आगामी’ मूल्य से ज्यादा बढ़े। अनुभवी कमोडिटी व्यापारियों के लिए, इस तरह की कीमत में बदलाव डिलीवरी से संबंधित मुद्दे की एक कहानी है, क्योंकि यह इंगित करता है कि कपास गांठें उपलब्ध हैं, लेकिन वितरण (डिलीवरी) नहीं हो रहा है। सेबी ने सचेत नियामक की तरह कपास की गांठ के नमूनों का परीक्षण क्यों नहीं किया जबकि बाजार में ‘गुणवत्ता’ का भय था? कमोडिटी बाजार के विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर पिछले नियामक फॉरवर्ड मार्केट कमीशन (एफएमसी) के तहत कृषि उत्पादों की गुणवत्ता का परीक्षण करने के लिए अक्सर यह कार्य किया जाता था, जब डिलीवरी की उपलब्धता के बावजूद स्पॉट और वायदा कीमतों के बीच मूल्य भिन्नता होती थी।

शिकायतकर्ता द्वारा पक्ष परिवर्तन

पीगुरूज के लेख और सेबी में बैठकों के बाद एक प्रमुख कार्यवाही यह है कि बड़ी मात्रा में कपास की गांठों का महाराष्ट्र का खरीददार, जिसने शिकायत दी थी, वह पीछे हट गया है और अब पूरे कपास गांठों की डिलीवरी लेने के लिए तैयार है! कपास व्यापारी पहले डिलीवरी लेने से क्यों अनिक्षुक था और मानसून के समय में भी अपना माल गोदामों में खराब होने के लिए क्यों छोड़ दिया था? सबसे महत्वपूर्ण बात, यह पता चला है कि व्यापारी को एक लिखित बयान देना पड़ा कि गुणवत्ता का मुद्दे नहीं था और उन्हें कोई शिकायत नहीं थी। सर्वप्रथम, कोई व्यापारी इस प्रकार की ज़हमत क्यों उठाएगा अगर व्यापार सामान्य प्रकार से किया जाता?

कपास गांठों के लिए वित्तपोषण इस मामले में एक और महत्वपूर्ण बिंदु है। यह पता चला है कि मुंबई का एक दलाल, जो नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल) के ग्राहकों से हजारों करोड़ रुपये ठगने के लिए स्पॉट एक्सचेंज मामले में आरोपी भी रहा है, कपास व्यापार के वित्तपोषण में शामिल था। क्या वस्तु विनियम व्यापार में निवेश सूची प्रबंधन की अनुमति है? कपास की गांठें खरीदने के लिए महाराष्ट्र के व्यापारी ने 200 करोड़ रुपये से लगाए और नमी पकड़ने तक कपास की डिलीवरी भी नहीं ली, उस व्यापारी को वित्तपोषण कहाँ से प्राप्त हुआ? क्या दलाली के ग्राहकों को अब घाटा उठाना पड़ेगा या गोदाम कंपनी चेक लेने जा रही है? क्या कपास व्यापारी, जिसने एमसीएक्स में बड़ी मात्रा में कपास की गांठें खरीदीं, मुंबई में प्रमुख विनिमय अधिकारियों से मिला और विनिमय परिसर का दौरा किया? (इसके साक्ष्य को पेश किया जा सकता है)। क्या एक्सचेंज ने कपास व्यापारी को इस मामले में मूल्य हेराफेरी का आरोप लगाकर कोई नोटिस जारी किया था, जिसके कारण उसे मुंबई भागना पड़ा था?

एमसीएक्स कॉटन कॉन्ट्रैक्ट (कपास अनुबंध) पर कारोबार करने वाले लुइस ड्रेफस (एलडी) और ग्लेनकोर दोनों ने 28 अगस्त को पहले लेख के प्रकाशन के बाद पीगुरूज को लगभग समान स्पष्टीकरण जारी किए हैं। पीगुरूज यह दोहराना चाहता है कि किसी भी समय यह कहने या कहने का प्रयास नहीं किया गया है कि एलडी या ग्लेनकोर ने इस वर्ष अपनी व्यापारिक गतिविधि के दौरान एमसीएक्स में कपास गांठों की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। यह सेबी के लिए एमसीएक्स पर अक्टूबर 2018 और अगस्त 2019 के बीच कपास गांठों की व्यापारिक गतिविधि के संबंध में पूरे मामले की जांच करने के लिए है।

आईजीआईडीआर के प्रोफेसर सुसान थॉमस और एमसीएक्स से सम्बंधित डेटा लीक के मुद्दे पर, पीगुरूज आने वाले दिनों में और खुलासे करेगा। अधिक जानकारी के लिए जुड़े रहें!

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

सेबी और एमसीएक्स के लिए कुछ प्रश्न

1. क्या मंजीत कॉटन ने अब एक बयान दिया है कि उसने एमसीएक्स से जुड़े गोदामों में कपास की गांठों की गुणवत्ता के बारे में कोई शिकायत नहीं की है?

2. क्या मंजीत कॉटन को एमसीएक्स में कॉटन कॉन्ट्रैक्ट में उनके सौदे के संबंध में एमसीएक्स द्वारा पहले कारण बताओ नोटिस भेजा गया था?

3. क्या मंजीत कॉटन के प्रमुख अधिकारियों ने हाल ही में कॉटन ट्रेडिंग मामले के संबंध में चर्चा के लिए मुंबई में एमसीएक्स मुख्यालय का दौरा किया?

4. क्या एमसीएक्स को पता है कि मुंबई के एक दलाल ने मंजीत कॉटन को एमसीएक्स पर कॉटन ट्रेडिंग के लिए वित्त पोषित किया था? क्या कमोडिटी ट्रेडिंग में निवेश सूची प्रबंधन की अनुमति है?

संदर्भ

[1] How SEBI has pulled ‘Cotton’ over its eyes on MCX mattersAug 28, 2019, PGurus.com

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