चिदंबरम, कार्ति जैसे व्यक्तियों के खिलाफ आरोप होने के बावजूद क्यों कार्यवाही से मुक्त होते हैं?

यह 200 पृष्ठों की पुस्तक है लेकिन मणि द्वारा विशिष्ट शैली में दी गई जानकारी बहुत विशाल है और यह जानकारी आने वाले कई वर्षों तक पाठकों को परेशान करेगी।

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मणि उत्तर ब्लॉक कार्यालय में बंद-द्वार सत्रों में रची गयी षड्यंत्रों के मुख्य गवाह है
मणि उत्तर ब्लॉक कार्यालय में बंद-द्वार सत्रों में रची गयी षड्यंत्रों के मुख्य गवाह है

मणि जो उत्तर ब्लॉक कार्यालय में बंद-द्वार सत्रों में रची गयी षड्यंत्रों के मुख्य गवाह है, हमें बताते हैं कि भगवा आतंक के विचार को कैसे अवधारणाबद्ध और निष्पादित किया गया।

भारत में उदार, लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष आदि मीडिया का दावा है कि पुणे के भीमा कोरेगांव दंगों के सिलसिले में देश के विभिन्न स्थानों से महाराष्ट्र पुलिस द्वारा पांच “मानवाधिकार कार्यकर्ताओं” गौतम नवलक्खा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव, वर्नन गोंसाल्वस और अरुण फेरेरा की 29 अगस्त की गिरफ्तारी से “वैश्विक उत्तेजना” हुई। सर्वोच्च न्यायालय में कुछ “प्रतिष्ठित इतिहासकारों” द्वारा उनकी ओर से पाँचों की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली गिरफ्तारी याचिकाओं और इनके गिरफ्तारी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस को उन लोगों, जिन्हें हिरासत में लिया गया था, को कारावास भेजने की इजाजत नहीं दी परंतु मेरे प्रिय पाठक, यदि इनकी जगह आप या मैं होते तो कोई भी हमारे बचाव में कोई नहीं आता और हम पुलिस या न्यायिक हिरासत में निश्चित ही होते। इन वीआईपी कार्यकर्ताओं को अदालत ने अपने घरों में आराम से रहने को कहा है।

तमिलनाडु में मदुरै की यात्रा के दौरान, मैं अचंभित हो गया जब मुझे हेनरी टिपगेन, मानव अधिकार कार्यकर्ता, नहीं, एक उद्योगपति, के स्वामित्व वाला महल दिखाया गया।

यह त्वरित उत्तराधिकार में पुलिस द्वारा की गई गिरफ्तारियों की दूसरी खेप है। जून में, महाराष्ट्र पुलिस ने यूएपीए और भारतीय दंड संहिता के कई वर्गों के तहत सुरेंद्र गडलिंग, रोना विल्सन, सुधीर ढवाले, शोमा सेन और महेश राउत को गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा है कि उनके पास पर्याप्त सबूत हैं जिससे ये सिद्ध होता है कि ये लोग माओवादियों के साथ जुड़े हुए हैं।

इन दो घटनाओं से मानव अधिकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का ढोंग करने वाले विभिन्न अधिकारियों द्वारा किया गया मीडिया आक्रमण (ब्लिट्जक्रीग)। इस लेखक की तरह एक व्यक्ति (कम औसत बुद्धि और दिन रात मेहनत करके अर्थप्राप्ति करनेवाला) और अन्य सामान्य लोग जीवन में पहली बार इन दस नामों को सुन रहे हैं। इन व्यक्तियों की गिरफ्तारी से उत्पन्न उथल-पुथल साबित करती है कि वे सामान्य लोग नहीं बल्कि ऐसे लोग हैं जिनका उच्च स्थान पर रहने वाले व्यक्तियों के साथ संबंध है। उन्हें बुद्धिजीवियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और दलित अधिकार कार्यकर्ताओं के रूप में वर्णित किया गया है। यह क्षेत्र पैसे अर्जित करने का क्षेत्र हैं जहां आप या मैं कभी भी प्रवेश नहीं कर सकते। इन व्यक्तियों के निवल महत्व को समझने के लिए इनके द्वारा की गई विदेश यात्रा और उन यात्राओं के दौरान ये जिन होटलों में रहते हैं उसको परखना पर्याप्त है। वे भारत के वास्तविक सात सितारा अभिजात वर्ग हैं जो जानते हैं कि न्यूनतम निवेश के साथ कैसे धन अर्जित किया जा सकता है।

तमिलनाडु में मदुरै की यात्रा के दौरान, मैं अचंभित हो गया जब मुझे हेनरी टिपगेन, मानव अधिकार कार्यकर्ता, नहीं, एक उद्योगपति, के स्वामित्व वाला महल दिखाया गया। उन्होंने इतनी संपत्ति कैसे अर्जित की ये सबसे बड़ा सवाल है। जो गुप्त और अब तक अप्रतिबंधित रहा है वह अदृश्य धागा है जो इन लोगों को जोड़ता है। इन शब्दों को आरवीएस मणि द्वारा लिखी पुस्तक के प्रस्ताव में लिखा गया है, एक नौकरशाह जिसने आंतरिक सुरक्षा और संसदीय कार्यकलाप में प्रत्यक्ष अनुभव हासिल करते हुए कई दशकों तक भारत सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के तहत विभिन्न विभागों में सेवा की है। मणि, जिन्हें आतंकवादी गतिविधियों की तहक़ीक़ात के लिए नियुक्त अधिकारियों के माध्यम से कष्ट (शारीरिक एवं मानसिक) पहुँचाया गया, ने अपने माता पिता को त्वरित उत्तराधिकार में इस वजह से खो दिया क्योंकि वे एक शक्तिशाली कांग्रेस नेता, जो उस समय गृह मंत्री था, द्वारा अपने पुत्र को दी गयी यातनाओं से पीड़ित थे।

“26/11 के बाद देश में एक सबसे अच्छी बात हुई, पी चिदंबरम को वित्त मंत्रालय से बाहर कर दिया गया और सुशील कुमार शिंदे को गृह मंत्रालय से बाहर कर दिया गया”!

मणि द्वारा लिखी पुस्तक का नाम “हिंदू आतंक का मिथक: गृह मंत्रालय की अंदरूनी जानकारी” है। इस समीक्षा के पाठक पूछ सकते हैं कि इन “मानवाधिकार कार्यकर्ताओं” की गिरफ्तारी के साथ इसका क्या संबंध है। इसका बहुत गहरा संबंध है, प्रिय पाठक। 29 अगस्त को हिरासत में लिए गए व्यक्तियों और जून में गिरफ्तार किए गए लोग सभी जुड़े हुए थे। ऐसे कई कारक हैं जो उन्हें एक करते हैं, चर्च के साथ उनके संबंध, महाराष्ट्र में तत्वों के साथ उनके सहयोग और उनके अदृश्य प्रायोजक और समर्थक।

मणि के पास कई चौंकाने वाला खुलासे है। मनमोहन सिंह की अगुआई वाली यूपीए सरकार के अनुसार, महाराष्ट्र में गडचिरोली माओवादी उपद्रवी जिला है। महाराष्ट्र के गडचिरोली के पड़ोसी छत्तीसगढ़ के इलाकों में माओवादियों ने कई हमले किए थे, जिससे सैकड़ों पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई। छत्तीसगढ़ पुलिस ने महाराष्ट्र के घुसपैठियों से कई बंदूकें जब्त की हैं और ये सभी बंदूकें महाराष्ट्र पुलिस द्वारा उपयोग की जाती हैं।

मणि शुरुआत में ही लिखते हैं: “पाठक इस अवधि के दौरान संसद में कई सवालों के जवाबों से पुष्टि कर सकते हैं कि इनमें से इस तरह के हमलों में, छत्तीसगढ़ के विपरीत, अन्य राज्यों में बहुत कम पुलिस कर्मियों ने अपनी जान गंवाई थी। लेकिन हर बार, पुलिसकर्मियों के हथियारों को नक्सलियों ने छीन लिया था। क्या यह एक ढाँचा था? या यह साजिश थी? या क्या यह पड़ोसी राज्य सरकार को नष्ट करने की साझेदारी थी, जिसे केंद्र में तत्कालीन सत्तारूढ़ दल द्वारा शासित नहीं किया गया था? संयोग से, महाराष्ट्र को उसी राजनीतिक दल द्वारा शासन किया गया था जो केंद्र में सत्तारूढ़ थी, यानी कांग्रेस पार्टी “। (पृष्ठ 6)।

मणि के अवलोकन और टिप्पणियाँ इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वह किसी को दोष नहीं देते। वह समाचार पत्रों में प्रकाशित जानकारी, 24X7 समाचार चैनलों और ग्राउंड ज़ीरो से प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त की गयी जानकारी पाठकों के साथ साझा करते है। वह पाठकों से खुद अपराधीयों को खोजने को कहते है। वह जानकारी जो प्रस्तुत करते है वही तथ्य हैं। सदस्यों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्नों के लिए संसद के दोनों सदनों में संबंधित मंत्रियों द्वारा प्रदान किए गए उत्तर। इसलिए, किसी भी संघ परिवार के तत्वों द्वारा उत्तर के किसी भी प्रकार के भगवाकरण की कोई संभावना नहीं है।

हालांकि पुस्तक हिंदू आतंक की अवधारणा पर केंद्रित है, जिसे सुशील शिंदे, पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह और हेमंत करकरे (महाराष्ट्र संवर्ग आईपीएस अधिकारी, जो 26/11 के आतंकवादी हमले में शहीद हुए थे) द्वारा राष्ट्रीय रिवायत में पेश किया गया था, जो बात मेरे ध्यान में आई वह ये है कि मणि ने बिनायक सेन जैसे पात्रों के बारे में कुछ टिप्पणियाँ की है, जिसे भारतीय मीडिया देवदूत के रूप में प्रस्तुत करती है। इसी देवदूत और उनकी पत्नी इलिना ने 12 जुलाई, 2009 को विनोद कुमार चौबे नामक युवा पुलिस अधीक्षक की हत्या की साजिश रची थी। सेन को यूपीए सरकार ने इस “अच्छे काम” के लिए पुरस्कृत करते हुए उसे भारतीय सरकार के उच्च अधिकार समिति का सदस्य नियुक्त किया। पूरे मानवाधिकार उद्योग ने उसे सभी आरोपों से मुक्त करने के लिए एक निर्दोष व्यक्ति के रूप में चित्रित करने के लिए बहुत प्रयास किया! भगवान शहरी माओवादी मित्रों के सहयोग से उनके द्वारा किए गए गंभीर अपराध के लिए सेन जैसे व्यक्तियों को माफ नहीं करेंगे।

26/11 और अन्य आतंकवादी हमलों, जिन्हें पाकिस्तान के साथ मिलकर एलईटी , जेईम जैसे संगठनों द्वारा भारत पर किया गया, पर लौटते है। मुझे याद है कि मुंबई के हमलों के बाद चेन्नई में एक सार्वजनिक भाषण में नरेंद्र मोदी के प्रसिद्ध आलोचक अरुण शौरी ने क्या कहा था। “26/11 के बाद देश में एक सबसे अच्छी बात हुई, पी चिदंबरम को वित्त मंत्रालय से बाहर कर दिया गया और सुशील कुमार शिंदे को गृह मंत्रालय से बाहर कर दिया गया”!

मणि ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा कि हसन को जेल से रिहा करने के लिए तत्कालीन अधिकारियों की सहमति से उन्हें अपहरण करने की साजिश थी।

मणि जो उत्तर ब्लॉक कार्यालय में बंद-द्वार सत्रों में रची गयी षड्यंत्रों के मुख्य गवाह है, शिंदे द्वारा पहले और फिर चिदंबरम की अध्यक्षता में और करकरे और अन्य लोगों द्वारा समर्थित, हमें बताते हैं कि भगवा आतंक के विचार को कैसे अवधारणाबद्ध और निष्पादित किया गया जिसमें एक निर्दोष सेना अधिकारी कर्नल पुरोहित और दो हिंदू भिक्षु साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और स्वामी असीमानंद की गिरफ्तारी और यातना देखी गई।

200 पृष्ठों की इस पुस्तक के सभी विवरण प्रकट करना उचित नहीं है। लेकिन इन पृष्ठों के माध्यम से मणि ने ये खुलासा किया है कि यह देश आतंकवादियों, माओवादियों, राजनेताओं और नौकरशाहों के एक वर्ग एवँ समर्थकों के संजाल द्वारा इस प्रकार बंदी बनाया गया है जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को धक्का दे सकता है। आईएसआई के भुगतान एजेंटों और अन्य एजेंसियों द्वारा देश की निर्णय लेने वाली प्रणाली में घुसपैठ के उदाहरण हैं। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की हिरासत से अजमल कसाब को 1989 में जेकेएलएफ की शैली, जब उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रूबैया सईद का अपहरण कर लिया था, में सहेजने का प्रयास किया गया था। तत्कालीन वी पी सिंह के नेतृत्व में यूएफ सरकार को अपहरणकर्ताओं से रूबैया को बचाने के लिए जेकेएलएफ के शेख अब्दुल हमीद, गुलाम नबी बट, नूर मोहम्मद कलवाल, मोहम्मद अल्ताफ और मुश्ताक अहमद जरगर को रिहा करना पड़ा।

मणि ने दृढ़ विश्वास के साथ कहा कि हसन को जेल से रिहा करने के लिए तत्कालीन अधिकारियों की सहमति से उन्हें अपहरण करने की साजिश थी। यह 200 पृष्ठों की पुस्तक भले ही है लेकिन इसमें मणि द्वारा विशिष्ट शैली में दी गई जानकारी बहुत विशाल है और आने वाले कई वर्षों तक पाठकों को परेशान करेगी। एक और बात, यदि आप बातों में बात निकाल पाए, तो आप निश्चित रूप से ये समझ जाएंगे कि राष्ट्र विरोधी तत्वों ने भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठान में घुसपैठ की है। यह विचारणीय है। तो, इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।

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