टीआरपी घोटाले में सीबीआई जांच से टीवी चैनल मालिक और संपादक परेशान?

अगर सीबीआई टीआरपी घोटाले की जांच करती है तो मीडिया दबंगों को अपनी गुप्त दुनिया के उजागर होने का डर है!

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अगर सीबीआई टीआरपी घोटाले की जांच करती है तो मीडिया दबंगों को अपनी गुप्त दुनिया के उजागर होने का डर है!
अगर सीबीआई टीआरपी घोटाले की जांच करती है तो मीडिया दबंगों को अपनी गुप्त दुनिया के उजागर होने का डर है!

शनिवार शाम, टीवी चैनल मालिकों/ संपादकों के सबसे बड़े संघ – न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने सरकार से टीआरपी घोटाले में सीबीआई की जाँच को वापस लेने का आग्रह किया। टीवी चैनल के मालिकों और संपादकों के संघ एनबीए द्वारा, सीबीआई द्वारा दर्ज किए गए मामले को वापस लेने की यह अजीब मांग आखिर क्यों? उत्तर आसान है। कोई भी टीवी चैनल नहीं चाहता है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) हर साल 70,000 करोड़ रुपये से अधिक के बंदरबाँट वाली गुप्त दुनिया में प्रवेश करे और मीडिया दबंगों को डर है कि सीबीआई के बाद, भारी राजस्व प्रवाह वाले टीवी चैनल उद्योग पर शिकंजा कसने की अगली बारी आयकर विभाग की होगी।

टीआरपी घोटाले पर मुंबई पुलिस की जांच के विपरीत, जो केवल अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी को लक्षित करने तक सीमित है, सीबीआई जांच का दायरा व्यापक है। टेलीविज़न रेटिंग पॉइंट्स (टीआरपी) घोटाले का खुलासा कुछ हफ्ते पहले हुआ, जब मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के ख़िलाफ़ जांच की घोषणा की, रिपब्लिक टीवी पर टीआरपी में हेरफेर का आरोप लगाया गया। इसे व्यापक रूप से महाराष्ट्र के सत्तारूढ़ गठबंधन (शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस) और टीवी चैनल के मालिक अर्नब गोस्वामी के बीच झगड़े से उत्पन्न एक राजनीतिक रूप से प्रेरित मामले के रूप में देखा गया है। मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज मामला उन घरों की कथित रिश्वतखोरी तक सीमित है जहां टीवी रेटिंग मीटर लगे हुए हैं और मुंबई पुलिस का मुख्य एजेंडा अर्नब गोस्वामी को सबक सिखाना है, जो पिछले चार महीनों से महाराष्ट्र में सत्तारूढ़ गठबंधन पर हमला कर रहे हैं।

एनबीए कि चिंता यह है कि अर्नब बनाम महाराष्ट्र सरकार झगड़ा सीबीआई के हाथों में पहुंच गया है, और सीबीआई को संपूर्ण टीआरपी व्यवसाय और बीएआरसी में सालों से चल रहीं धोखाधड़ी की गतिविधियों की जाँच करने का अधिकार प्राप्त है।

पिछले हफ्ते उत्तर प्रदेश में एक सामान्य शिकायत पर टीआरपी के हेरफेर पर एक अन्य मामला दर्ज किया गया था और कुछ ही दिनों में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया। मामला टीआरपी घोटाले के सामान्य मुद्दे पर है, जहां समस्या सभी टीवी चैनलों से शुरू हुई। अप्रैल 2018 में, पीगुरूज ने इस टीआरपी घोटाले और आंकड़ों की हेराफेरी में बीएआरसी (ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल) नामक एक निजी एजेंसी की भूमिका पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित किया था। रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे स्टार टीवी इंडिया और अन्य टीवी चैनलों द्वारा नियंत्रित बीएआरसी को सरकार द्वारा, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (टीआरएआई) के दिशानिर्देशों का उल्लंघन करके इस रेटिंग व्यवसाय को चलाने की अनुमति दी गई थी[1]। हाल के एक लेख में हमने यह भी बताया है कि टीवी रेटिंग में इस अवैज्ञानिक और धोखाधड़ी वाले तरीके को कैसे रोका जाए[2]

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

अर्नब गोस्वामी और कुछ अन्य चैनलों जैसे टीवी 9 समूह ने हाल ही में एनबीए से बाहर निकलकर एक और निकाय का गठन किया है जिसे नेशनल ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन (एनबीएफ) कहा जाता है[3]। लेकिन अभी भी एनबीए इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा की अध्यक्षता में एक बड़ी संस्था है। टाइम्स समूह, इंडिया टुडे समूह, मुकेश अंबानी के नेटवर्क 18, एनडीटीवी, ज़ी ग्रुप, एबीपी ग्रुप, और प्रमुख क्षेत्रीय चैनलों जैसे सभी प्रमुख टीवी चैनल एनबीए का हिस्सा हैं, जो भारत के 70,000 करोड़ रुपये के टीवी विज्ञापन बाजार के 90 प्रतिशत से अधिक राजस्व को रखते हैं।

उनकी (एनबीए) चिंता यह है कि अर्नब बनाम महाराष्ट्र सरकार झगड़ा सीबीआई के हाथों में पहुंच गया है, और सीबीआई को संपूर्ण टीआरपी व्यवसाय और बीएआरसी में सालों से चल रहीं धोखाधड़ी की गतिविधियों की जाँच करने का अधिकार प्राप्त है। सीबीआई जांच टीवी चैनल कंपनियों के राजस्व और बहीखातों तक भी पहुँचेगी और सभी चैनल मालिकों को संभावित आयकर कार्यवाही का डर सता रहा है। यह एक स्पष्ट कारण है कि एनबीए, सरकार के सामने सीबीआई की प्राथमिकी (एफआईआर) को वापस लेने के लिए गुहार लगा रहा है।

एनबीए सरकार से सीबीआई की एफआईआर को वापस लेने का निर्देश देने के लिए कैसे कह सकता है? ठीक है, अगर एनडीटीवी सूचना एवं प्रसारण (आई एंड बी) द्वारा चैनल को देश विरोधी गतिविधियों हेतु 24 घण्टे के लिए बंद रखने के आदेश के बावजूद चालू रह सकता है, तो इस घटना में भी कोई आश्चर्य नहीं! क्या इन समाचार प्रसारकों को बुनियादी कानून का कोई ज्ञान है? एक बार एफआईआर दर्ज होने के बाद, यह केवल जांच एजेंसी की क्लोजर रिपोर्ट से संतुष्ट होने के बाद कोर्ट द्वारा बंद की जा सकती है। यह कुछ ऐसा है जैसे टेलिकॉम संचालक 2जी घोटाले या कोयला खनिक, कोयला घोटाले की जांच रोकने का निर्देश देने के लिए सरकार से कह रहे हो।

यदि सब कुछ पाक-साफ है, तो टीवी चैनल के मालिकों और संपादकों के बीच जांच को लेकर इतनी चिंता क्यों? टीवी चैनल टीआरपी के लिए आपस में झगड़ते हैं, क्योंकि यही टीआरपी विज्ञापन राजस्व का हिस्सा तय करती है। लेकिन एनबीए की आपत्ति से पता चलता है कि वे नहीं चाहते कि जांच एजेंसी उनके धन प्रवाह की दुनिया में प्रवेश करे। यह एक कैसिनो में खिलाड़ियों के बीच होने वाले झगड़े की तरह है और जब पुलिस पहुँचती है तो वे एकजुट हो जाते हैं।

संदर्भ:

[1] TRP Scam: Data fudging or leakages by totally foreign companies-controlled TRP rating agency BARC?Apr 22, 2018, PGurus.com

[2] टीआरपी घोटाला हुआ उजागर। टीवी रेटिंग में धोखाधड़ी को कैसे रोकें?Oct 9, 2020, hindi.pgurus.com

[3] NBF with Arnab vs Rajat Sharma’s NBA — fight is on to regulate India’s news TV channelsAug 14, 2019, The Print

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