तिब्बत पर कब्जा सिर्फ एक शुरुआत, चीन फिंगर फाइव हासिल करने की कोशिश कर रहा है: तिब्बत के नेता लोबसांग सांगे

सांगे ने कहा कि तिब्बत सिर्फ शुरुआत थी, उनके एजेंडे में लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल हैं।

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सांगे ने कहा कि तिब्बत सिर्फ शुरुआत थी, उनके एजेंडे में लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल हैं।
सांगे ने कहा कि तिब्बत सिर्फ शुरुआत थी, उनके एजेंडे में लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल हैं।

चीनी विस्तारवादी नीतियां विश्व समुदाय के लिए खतरा हैं – संगे

तिब्बत के “कब्जे” के बाद, चीन अब “फाइव फिंगर्स” पाने के लिए कड़ी कोशिश कर रहा है, शीर्ष तिब्बती नेता लोबसांग सांगे ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि, चीनी विस्तारवादी नीतियां विश्व समुदाय के लिए खतरा हैं और सभी को इसके लिए सचेत होना होगा। उन्होंने दिल्ली में लोकतंत्र, बहुलवाद और मानव अधिकारों के केंद्र (सीडीपीएचआर) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि तिब्बत को बफर जोन के रूप में खोना, भारत और चीन की सीमा समस्या और संबद्ध सैन्य लागत के मामले में भारत को बेहद नुकसान पहुँचाया है।

केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (निर्वासित तिब्बती सरकार) के अध्यक्ष लोबसांग ने आरोप लगाया – “तिब्बत पर कब्ज़ा सिर्फ शुरुआत थी। आपने गालवान की घटना देखी, कितने सैनिकों ने अपनी जान गंवाई। तिब्बत तो हथेली की शुरुआत जैसे है, लेकिन फाइव फिंगर्स अभी भी बचे हुए हैं, जिन्हें चीनी सीपीसी (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी) पाने की पुरजोर कोशिश कर रही है।” सांगे हार्वर्ड लॉ स्कूल से कानून की पढ़ाई की और अब अमेरिका में बस गए है। सांगे का जन्म 1968 में एक शरणार्थी समुदाय में भारत के दार्जिलिंग में हुआ था और उन्होंने हार्वर्ड में अध्ययन के लिए फुलब्राइट छात्रवृत्ति प्राप्त की।

उन्होंने कहा कि बहुलतावाद और विविधता, मानव अधिकार और स्वतंत्रता भारत को एक साथ बांधती है।

तिब्बत की फाइव फिंगर्स चीन की विदेश नीति है, जो तिब्बत को चीन की दाहिनी हाथ की हथेली मानती है, जिसकी परिधि पर पांच उंगलियां हैं: लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश, यह चीन की जिम्मेदारी है कि ये क्षेत्र “आजाद हो”। लोबसांग ने कहा – “भारत को यह समझने की जरूरत है कि तिब्बत में जो हो रहा है, वह मूल योजना है और यही झिंजियांग और हांगकांग में हो रहा है। चीन को समझें और उससे निपटें।”

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

उन्होंने कहा कि बहुलतावाद और विविधता, मानव अधिकार और स्वतंत्रता भारत को एक साथ बांधती है। उन्होंने आगे की – “बहुलवाद भारत की नींव है। बहुलतावाद और विविधता भारत को एक साथ बांधती है, मानव अधिकार और स्वतंत्रता भारत को एक साथ बांधती है लेकिन चीन एक अधिक निरंकुश प्रणाली ला रहा है, लेकिन एशिया के लिए लोकतंत्र और विविधता के साथ विकास चीनी मॉडल से बेहतर है।”

लोबसांग ने यह भी आरोप लगाया कि चीनी विस्तारवादी नीतियां विश्व समुदाय के लिए एक “खतरा” हैं। “इसलिए विश्व समुदाय को जल्द से जल्द सचेत हो जाना चाहिए। तिब्बत और शिनजियांग में अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के संबंध में चीन के खिलाफ खड़ा होना किसी एक देश या देशों के छोटे समूह के बस में नहीं है, बल्कि पूरे विश्व समुदाय को एकजुटता में खड़े होने की जरूरत है

उन्होंने आगे दावा किया कि गरीबी उन्मूलन के नाम पर, चीन सरकार तिब्बत जैसे अल्पसंख्यक क्षेत्रों में मुख्य भूमि के चीनी तरीकों को नियोजित कर रही है, जिससे एक ऐसा वातावरण तैयार हो सकता है जिससे तिब्बती पहचान खतरे में पड़ सकती है। “चीन की सत्तावादी नीतियां नहीं बल्कि विकास के लिए लोकतांत्रिक नीतियां जो विविधता का सम्मान करती हैं, यही दुनिया को चाहिए।”

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि लोकतंत्र के साथ विकास वाला भारत का मॉडल लोकतंत्र के बिना विकास के चीनी मॉडल से बेहतर है।

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