महा पहेली: अब वक्त आ गया है कि भाजपा शिव सेना की मदद कर उसे संकट से बाहर निकाले

उद्धव को मनाने और राजग में शिवसेना को वापस लाने में केवल कुछ शब्द लगेंगे। क्या बीजेपी ऐसा करेगी?

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उद्धव को मनाने और राजग में शिवसेना को वापस लाने में केवल कुछ शब्द लगेंगे। क्या बीजेपी ऐसा करेगी?
उद्धव को मनाने और राजग में शिवसेना को वापस लाने में केवल कुछ शब्द लगेंगे। क्या बीजेपी ऐसा करेगी?

महाराष्ट्र की राजनीति पर लेखक द्वारा पिछली श्रृंखला को पढ़ा जा सकता है- ‘बीजेपी ने कैसे अपने आप के लिए गड्डा खोदा’) और ‘भाजपा द्वारा खुद के लिए खोदे गए गड्ढे में शिवसेना कैसे कूद गई?’

जैसा कि अपेक्षित था, महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन घोषित किया गया। आदित्य ठाकरे ने व्यंग्य करते हुए कहा कि “राज्यपाल ने दो दिनों का समय जो हमने मांगा था उसके बजाय छह महीने का समय हमें दिया।” यह अनावश्यक व्यंग्य ही शिवसेना की कई समस्याओं का मूल कारण है। जिस क्षण शिवसेना या राकांपा या यहां तक कि कांग्रेस राज्यपाल के पास पहुँचते हैं, वे सरकार बनाने की स्थिति में होते हैं, राष्ट्रपति शासन हटा दिया जाएगा। यह जानते हुए भी यदि पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चुना। इसके बजाय, उन्हें 10 जनपथ का दरवाजा खटखटाना चाहिए था ताकि उन्हें कांग्रेस से समर्थन पत्र मिल सके। यदि शिवसेना व्यंग्य करना चाहती थी, तो उन्हें कांग्रेस पर करना चाहिए जो समर्थन पत्र के लिए आदित्य को राजभवन में करीब एक घंटे तक इंतजार करवाती रही। क्या आदित्य कांग्रेस के साथ व्यंग्य कर सकते हैं? नहीं।

इससे पहले शिव सैनिकों ने देखा था कि कैसे शिवसेना प्रमुख ने महाराष्ट्र की राजनीति के भीष्म पितामह शरद पवार और कांग्रेस की रानी के साथ वार्तालाप शुरू की। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि राज्यपाल ने कार्यवाही कैसे की, अभी भी यह संभव है कि अगली सरकार एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन से शिवसेना द्वारा बनाई जा सकती है या तो मुद्दा-आधारित समर्थन प्रदान कर या इसका हिस्सा बनकर। हालांकि एनसीपी शीर्ष पद के लिए दावेदारी पेश कर सकती थी, लेकिन वे अच्छी तरह जानते थे कि यदि सीएम शिवसेना से नहीं हैं तो शिवसेना गठबंधन में शामिल नहीं होगी। अगर एसएस सीएम पद का दावा छोड़ सकती है, तो वे बीजेपी के साथ बने रहेंगे और एनसीपी और कांग्रेस के साथ बात करने की बिल्कुल जरूरत नहीं होगी।

हालांकि, एनसीपी / कांग्रेस आदित्य को सीएम उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे और इसलिए हर वरिष्ठ सैनिक स्वयं को उस पद का दावेदार बता सकतेे है। पार्टी को टूटने से रोकने के लिए उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनने के लिए मजबूर किया जाएगा। हालांकि यह उद्धव ठाकरे और शिवसेना की जीत के रूप में दिखाई दे सकता है, लेकिन वास्तव में, सीएम बनना उद्धव के लिए एक पदावनति होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके पिता और एसएस के संस्थापक, मूल प्रधान – जिनके नाम पर अभी भी पार्टी हमेशा वोट मांगती है, वह हमेशा मानते थे कि वह एक राजा थे और मंत्री नहीं। उन्होंने हमेशा कहा कि वह सरकार का हिस्सा नहीं होंगे। शिवसेना के सदस्यों द्वारा, मुख्यमंत्री को पार्टी प्रमुख के अधीनस्थ माना जाता है।

सीएम के पद को साझा करने के बारे में सेना द्वारा गलत धारणा दी गयी। मुझे आश्चर्य है कि बीजेपी इस पर उनसे सवाल क्यों नहीं कर पाई। अगर सीएम कार्यकाल को साझा करने का ऐसा कोई समझौता था, तो उद्धव ठाकरे ने शिवसैनिक सीएम के लिए वोट क्यों नहीं मांगे?

एक पल के लिए, महा-शिव-आघाडी पर विचार करें, एसएस, एनसीपी और कांग्रेस का गठबंधन सत्ता में आता है। शुरुआती हिचकी पर काबू पाने के बाद, कांग्रेस को एहसास होगा कि अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए सरकार में शामिल होना समझदारी हो सकती है। सरकार कब तक बच सकती है? यहां तीन पार्टियां हैं जो तीन अलग-अलग विपरीत विचारधाराएं रखती हैं जैसा कि वे दावा करते हैं। चुनाव हारने के बाद, एनसीपी और कांग्रेस, एसएस के साथ गठबंधन क्यों करना चाहते हैं? क्योंकि वे दूसरा चुनाव लड़ने में समर्थ नहीं हैं।

देश और राज्य में मौजूदा स्थिति को देखते हुए, बीजेपी ने एक साथ तीनों दलों पर बढ़त बना ली है। एक, अयोध्या के फैसले के बाद, हिंदुत्व के मुद्दे पर, खासकर कांग्रेस के साथ जोड़ी बनाने के बाद, एसएस बीजेपी पर बढ़त नहीं बना सकती। एनसीपी की किस्मत ज्यादा नहीं बदल सकती क्योंकि पवार को समर्पित एक निश्चित वोट शेयर है। एसएस की ही तरह कांग्रेस भी हार जाएगी। इसलिए कांग्रेस गठबंधन में शामिल होना चाहती थी।

क्या इसका मतलब है कि गठबंधन एक स्थिर सरकार प्रदान करेगा? तो इसका उत्तर है ‘नहीं‘। कांग्रेस को जल्द ही शिवसेना के साथ गठबंधन का नकारात्मक पहलू पता चलेगा। अन्य सभी राज्यों में, जहां वह सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) होने का दावा करती है (पार्टी के लिए इसका मतलब जो भी हो), वह अल्पसंख्यक वोट खो देगी। अपनी वर्तमान विषम परिस्थिति को देखते हुए, कांग्रेस अभी भी आगे बढ़ सकती है और लघु अवधि के धन की आवश्यकता के लिए एसएस का समर्थन कर सकती है। लेकिन, खुद को धर्मनिरपेक्षता के अग्रदूत के रूप में पेश करने के लिए, वे पहले मौके पर ठाकरे को दिया समर्थन वापस खींच लेंगे। तो, अंततः हारने वाली शिवसेना होगी। महा-शिव-अगाड़ी में केवल राकांपा ही जीत की स्थिति में है क्योंकि शिवसेना महाराष्ट्र पर अपना नियंत्रण खो देगी और कांग्रेस तो हर जगह हार ही रही है।

अब क्या बीजेपी को शिवसेना के ऐसे बुरे व्यवहार से खुश होना चाहिए?

सुब्रमण्यम स्वामी का हवाला देते हुए – जो नैतिकतावादी भीष्म की भूमिका नहीं निभाने के बारे में चेतावनी देते हैं, जिन भीष्म ने चुपचाप द्रौपदी के कपड़े उतरते हुए देखा। अगर बीजेपी ने चुप रहना चुना, तो इसका मतलब है कि पार्टी ने महान महाकाव्य से कुछ नहीं सीखा है। आप बाद में एसएस के साथ हिसाबकिताब बराबर कर सकते हैं, लेकिन यह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचारधारा के साथ तालमेल बिठाने का समय है। यह सच है कि मीडिया में सार्वजनिक रूप से भाजपा को बुरा भला बोलकर शिवसेना बुरा बर्ताव करती है और लोग उसे याद रखेंगे। वही लोग यह भी याद रखेंगे कि बड़ा सहयोगी होने के नाते बीजेपी शिवसेना को भ्रष्ट पार्टियों के साथ ठगबंधन में शामिल होने से रोकने में कैसे विफल रही।

सीएम के पद को साझा करने के बारे में सेना द्वारा गलत धारणा दी गयी। मुझे आश्चर्य है कि बीजेपी इस पर उनसे सवाल क्यों नहीं कर पाई। अगर सीएम कार्यकाल को साझा करने का ऐसा कोई समझौता था, तो उद्धव ठाकरे ने शिवसैनिक सीएम के लिए वोट क्यों नहीं मांगे? चुनावों के प्रचार में उद्धव ने कभी भी शिवसेना के मतदाताओं से शिवसेना के लिए वोट इसलिए नहीं मांगा ताकि पार्टी का कोई व्यक्ति सीएम बन सके। बीजेपी इस सवाल को उठाने में क्यों विफल रही यह मेरी समझ से परे है। 50-50 में शिवसेना की व्याख्या कुछ ऐसी है जो मतदाताओं को प्रभावित करने में विफल रहेगी।

पूरे भारत में इसकी वर्तमान आरामदायक स्थिति को देखते हुए, बीजेपी को भारतीयों द्वारा बड़ी शक्ति सौंपी गयी है और इसलिए उनके पास वैचारिक ताने-बाने को बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है।

शिवसेना और उसके नेताओं को एक बात का एहसास होना चाहिए कि पांच दशक पुरानी पार्टी होने के बावजूद, शिवसेना अपने दम पर सत्ता में आने में विफल रही, जबकि कई छोटे क्षेत्रीय दलों ने अपने राज्यों पर शासन किया है। यह तथ्य शिवसेना के बीजेपी अलग होने के अपने निर्णय को बदलने को मान जाने के लिए पर्याप्त है। और, उद्धव का यह तर्क कि उन्होंने अपने दिवंगत पिता से शिवसेना के सीएम का वादा किया था, तथ्यात्मक रूप से गलत है। बाल ठाकरे के समय में भी शिवसेना सीएम रहा; वास्तव में, दो, क्योंकि मनोहर जोशी की जगह नारायण राणे को मुख्यमंत्री खुद बाल ठाकरे ने बनाया था। अगर उद्धव ने शिवसेना के सीएम का वादा किया, तो इसका मतलब है कि शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन के बिना बहुमत की सरकार बनाएगी, जिसे बाला साहेब नाम देते हैं। इसलिए उद्धव ने शिवसेना के सीएम के बारे में जो भी कहा वह गलत था।
एक बार शिवसेना ने सीएम पद पर कब्जा कर लिया, तो आगे चर्चा करना आसान है। आदित्य को उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है और उद्धव सबसे शक्तिशाली शिवसेना प्रमुख हैं। आदित्य प्रशासन सीख सकते हैं, जो सामयिक लड़ाकू की भूमिका निभाने से पूरी तरह से एक अलग अध्याय है। प्रशासन संभालना जिम्मेदार बनाता है।

गौर कीजिए कि शिवसेना के लिए भाजपा ने क्या बलिदान दिया। सुरेश प्रभु को मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया और किरीट सोमैया को टिकट से वंचित कर दिया गया। यदि सहयोगी दल एक साथ नहीं हैं, तो स्वाभाविक है कि सोमैया पूरी ताकत के साथ बीजेपी में लौटकर शिवसेना से लड़ेंगे। वर्तमान स्थिति को देखते हुए क्या सेना बीएमसी को भी बरकरार रख पाएगी? बीजेपी छोड़ने से केवल सेना को खोना पड़ेगा, जिसमें उद्धव ठाकरे की सीएम पद पर पदावनति भी शामिल है। लोग ध्यान देंगे कि किसने सत्ता के लिए महायुति छोड़ी और शायद सबसे भ्रष्ट दो पार्टियों राकांपा और कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाया।

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

 

समय आ गया है कि भाजपा राज ठाकरे को भी शिवसेना में लाए। यदि राज भी शिवसेना में शामिल हो जाते हैं, तो इसके भाग्य की निरंतर गिराव उलट हो सकता है। अपनी ओर से, हालांकि इसने अपने अन्य सभी सहयोगियों को नष्ट कर दिया, बीजेपी ने कभी भी शिवसेना के साथ नहीं खेला। यह शिवसेना ही थी जिसने हमेशा भाजपा को उकसाया। एनडीए में वापस लौटने के लिए अभी भी समय है क्योंकि कुछ भी ठोस नहीं हुआ है।

क्या बीजेपी उद्धव को यह नहीं दिखा सकती है कि एनसीपी और आईएनसी के साथ सरकार बनाने में उनका भविष्य क्या होगा? पहले से ही सोनिया ने औपचारिक समर्थन रोककर उसे इतालवी दरबार का स्वाद दे दिया है। उद्धव ने विधानसभा चलाने और बिल पास करने की अपेक्षा कैसे की जिसमें उन्हें एनसीपी और कांग्रेस की भावनाओं और इच्छाओं को समायोजित करना होगा? उन्हें एहसास हो सकता है कि संजय राउत ने अपने संपादकीय से बीजेपी को कितना परेशान किया। लेकिन, क्या उंगलियों को जलाकर सीखना आवश्यक है?

जैसा कि स्पाइडरमैन ने कहा, अधिक शक्ति के साथ अधिक जिम्मेदारी आती है। पूरे भारत में इसकी वर्तमान आरामदायक स्थिति को देखते हुए, बीजेपी को भारतीयों द्वारा बड़ी शक्ति सौंपी गयी है और इसलिए उनके पास वैचारिक ताने-बाने को बनाए रखने की बड़ी जिम्मेदारी है। यह भाजपा के लिए वास्तविक अर्थों में बड़े भाई की भूमिका निभाने का समय है। वह नहीं जो छोटे भाई से कैंडी छीनता है बल्कि वह जो छोटे भाई की रक्षा करता है। दोनों तरफ से गलतियां हुईं और हमेशा उन्हीं पर ध्यान लगाए रखने से कोई फायदा नहीं। आज शिवसेना के साथ जो हो रहा है वह कल भाजपा के साथ भी हो सकता है। राजनीति अनिश्चितताओं का खेल है। और बीजेपी के पास शकुनि नहीं है जो पासों को नियंत्रित कर सके।

जैसा कि किसी ने कहा, जिसने सबसे बुरे को होने से रोका, वह उससे बेहतर है जो स्वयं को बुरे से बचाया। इसके लिए अमित शाह और नरेंद्र मोदी को सिर्फ एक फोन कॉल करने की जरूरत है और नितिन गडकरी को मातोश्री जाने की। अगर बीजेपी और एसएस हमेशा के लिए अलग हो गए, तो नुकसान केवल इन पार्टियों का नहीं है। इतिहास याद रखेगा कि भारतीय मुगलों और अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होने में विफल होने के बाद – इटालियंस के खिलाफ एकजुट होने में कैसे विफल रहे। क्या मुझे कुछ और कहने की ज़रूरत है? इसके अलावा, शिवसेना को आपकी जरूरत है। उद्धव ने पहले ही संकेत छोड़ दिए। उन पर विचार करें।

उद्धव को मनाने और राजग में शिवसेना को वापस लाने में केवल कुछ शब्द लगेंगे। क्या बीजेपी ऐसा करेगी? मुझे आशा है कि वे करेंगे।

ध्यान दें:
1. यहां व्यक्त विचार लेखक के हैं और पी गुरुस के विचारों का जरूरी प्रतिनिधित्व या प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

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