मथुरा में भी पूजास्थल अधिनियम कटघरे में

मथुरा की एक जिला अदालत ने गत सप्ताह श्री कृष्ण जन्मभूमि और अन्य दावेदारों की शाही ईदगाह मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक का दावा करने वाली याचिका स्वीकार कर ली है।

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मथुरा में भी पूजास्थल अधिनियम कटघरे में
मथुरा में भी पूजास्थल अधिनियम कटघरे में

मथुरा कृष्ण-जन्मभूमि में भी पूजास्थल अधिनियम को चुनौती

वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर उपजे विवाद के बीच अब मथुरा में भी पूजास्थल अधिनियम को चुनौती देने की भूमिका तैयार हो रही है। मथुरा की एक जिला अदालत ने गत सप्ताह श्री कृष्ण जन्मभूमि और अन्य दावेदारों की शाही ईदगाह मस्जिद की जमीन के मालिकाना हक का दावा करने वाली याचिका स्वीकार कर ली है।

मथुरा का विवाद 13.37 एकड़ भूमि के मालिकाना हक से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह जमीन भगवान श्री कृष्ण विराजमान की है। याचिकाकर्ताओं ने श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और मस्जिद ईदगाह ट्रस्ट के बीच 1968 में हुए समझौते को भी चुनौती दी है।

ईदगाह श्री कृष्ण जन्मभूमि के ठीक सामने है और ज्ञानवापी काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में है। ईदगाह की जमीन के मालिकाना हक का दावा करने वाले याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मस्जिद के ट्रस्ट और श्री कृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान के बीच हुआ समझौता एक धोखाधड़ी है।

मंदिर के ट्रस्ट और निजी दावेदारों का कहना है कि चूंकि उक्त जमीन ट्रस्ट के नियंत्रण में थी तो मंदिर प्रबंधन समझौता करने की स्थिति में ही नहीं था।

दूसरी तरफ ईदगाह पक्ष के वकील का कहना है कि सोसाइटी ट्रस्ट का ही एजेंट है। ट्रस्ट ही सोसाइटी के प्रमुख की नियुक्ति करता और 1968 में किया गया समझौता कानूनी रूप से किया गया था। अदालत इस समझौते की समीक्षा करने पर राजी हुई है।

ज्ञानवापी मस्जिद और शाही ईदगाह मस्जिद दोनों पूजा स्थल अधिनियम, 1991 के दायरे में आते हैं लेकिन अब ये दोनों मामले अदालत में हैं।

ऐसी स्थिति में यह देखना रोचक होगा कि अदालत इस मामले को कैसे सुलझाता है। अधिनियम में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि आजादी पाने के दिन यानी 15 अगस्त 1947 को जिस भी पूजास्थल का जो स्वरूप था, वही आगे भी जारी रहेगा।

इसी अधिनियम की धारा 3 के तहत किसी भी तरह से धार्मिक स्थान के चरित्र यानी स्वरूप में बदलाव को प्रतिबंधित किया गया है।

हालांकि, इस अधिनियम के दायरे में अयोध्या के मामले को नहीं लाया गया है। अधिनियम की धारा पांच में यह स्पष्ट रूप से लिखा है कि यह अधिनियम राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद मामले पर लागू नहीं है।

गत साल भाजपा नेता एवं वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इस अधिनियम को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उपाध्याय का कहना है कि यह अधिनियम धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत के खिलाफ है।

उपाध्याय की याचिका में कहा गया है कि केंद्र ने धार्मिक स्थलों और पूजा स्थलों पर अतिक्रमण के खिलाफ उपाय पर रोक लगाई हुई है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 226 के तहत हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध इस मामले में अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकते हैं। यह याचिका मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि से संबंधित है।

उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 12 मार्च को नोटिस भी जारी किया था लेकिन अभी तक इस पर सुनवाई शुरू नहीं हुई है।

अधिनियम का विरोध करती इसी तरह की एक अन्य याचिका भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जिसे विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ ने दायर किया है।

सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस एस ए बोबडे की अगुवाई वाली पीठ पूजास्थल अधिनियम की वैधता की जांच करने पर मार्च 2021 में सहमत हुई थी।

पूजास्थल अधिनियम के विरोध में भाजपा नेता सुब्रमणियम स्वामी ने भी जून 2020 में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 26 मार्च 2021 को उनकी याचिका स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार से उस पर जवाब मांगा था।

वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद ने इन दिनों काफी सुर्खियां बटोरी हैं लेकिन ईदगाह मस्जिद का मामला अभी निचली अदालत में ही है। ये दोनों मामले पूजास्थल अधिनियम की दोबारा व्याख्या करने पर जोर देने वाले हैं।

यह देखने वाली बात होगी कि हिंदू पक्ष किस तरह इस अधिनियम की खामियों को तलाश कर सदियों पुराने अपने धार्मिक स्थलों पर दावे को पुख्ता करते हैं और मुस्लिम पक्ष किस तरह इस अधिनियम का हवाला देकर अपना पक्ष मजबूत करते हैं।

[आईएएनएस इनपुट के साथ]

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