बोफोर्स घोटाले की जांच और परीक्षण को कैसे व्यवस्थित तरीके से नुकसान पहुँचाया गया, यह मामला अभी भी उच्चतम न्यायालय के समक्ष लंबित है। क्या सीबीआई को कार्रवाई का आदेश दिया जाएगा?

हिंदुजा बंधु बिचौलियों का एक ऐसा उदाहरण हैं जो अपने लाभ के लिए भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को चालाकी से तोड़-मरोड़ सकते थे

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हिंदुजा बंधु बिचौलियों का एक ऐसा उदाहरण हैं जो अपने लाभ के लिए भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को चालाकी से तोड़-मरोड़ सकते थे
हिंदुजा बंधु बिचौलियों का एक ऐसा उदाहरण हैं जो अपने लाभ के लिए भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को चालाकी से तोड़-मरोड़ सकते थे

पीगुरूज ने मामले को दिशाविहीन करने में शामिल खिलाड़ियों, बिचौलियों और कॉर्पोरेट दलालों का पर्दाफाश करना और बाद की जांच से राजनीति को दूर रखना क्यों महत्वपूर्ण है यह समझाया है। कई अंतरराष्ट्रीय ऑपरेटर बिचौलियों के माध्यम से बोफोर्स जांच को दिशाहीन करने की साजिश में शामिल थे। इस षड्यंत्र को कई सौदों में दोहराया गया जिसमें राजनीतिक वर्ग ने प्रतिद्वंद्वी को बदनाम करने के लिए चालें चलीं और शायद बिचौलियों ने भरपूर लाभ अर्जित किया। हमने पहले ही सूचित किया है कि बोफोर्स घोटाले की जांच और परीक्षण को विफल करने के पीछे कौन लोग थे[1]

हिंदुजा बंधुओं को चिंता है कि उनका स्विस खाता ईरान और विद्रोहियों के साथ उनके कई अवैध बंदूक सौदों का खुलासा करेगा। इसलिए, 1991 के बाद से, हिंदुजा अपील और अन्य कानूनी बाधाओं को लागू करके अपने बोफोर्स खाते की रक्षा कर रहे हैं।

भाग 3: साजिश, समयावधि और आगे का रास्ता

विशेष जांच दल ने कहा है कि “राजीव गांधी का नाम एक लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि वह इतिहास के सबसे बड़े रक्षा अनुबंध सौदों में से एक में प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के रूप में शामिल थे।” किसी को यह समझने में भ्रम की स्थिति हो सकती है कि इसमें गलत क्या था। यह सरकार और रक्षा मंत्रालय को तय करना होता है कि उन्हें कितनी जल्दी उपकरणों की जरूरत है और सिर्फ इसलिए कि सरकार ने इस सौदे को पूरा करने में एक त्वरित निर्णय लिया, गड़बड़ी को साबित नहीं करता। आमतौर पर, यह कहा जाता है कि देरी और लालफीताशाही (गैर-जरूरी औपचारिकताएं) भ्रष्टाचार को जन्म देती है लेकिन यहां विशेष जांच दल (एसआईटी) के लोगों को अजीब रूप से एक अलग दृष्टिकोण मिला। आरसी शर्मा, जिन्होंने सीबीआई प्रमुख के रूप में जोगिंदर सिंह के बाद पदभार संभाला, ने सार्वजनिक रूप से टिप्पणी की कि, राजीव गांधी को बोफोर्स भुगतान के लिए दोषी ठहराने का कोई सबूत नहीं है। प्रेस का एक विचार है कि शर्मा सामान्य रूप से कांग्रेस के करीबी थे और विशेष रूप से सोनिया के।

विशेष रूप से हथियारों के सौदे में, दो देशों के बीच समझौतों पर हस्ताक्षर किए जाते हैं, लेकिन यह आम बात है कि इसमें बिचौलियों या दलालों नामक कुछ व्यक्तियों द्वारा मदद की जाती है, जो आम तौर पर मोल-भाव करने में विशेषज्ञ होते हैं। यह राजीव गांधी थे जिन्होंने बोफोर्स से साफ कहा था कि किसी भी बिचौलिये की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और बोफोर्स ने भारत को ‘कोई बिचौलिया नहीं‘ प्रमाण पत्र दिया था। राजीव ने ओलाफ पालमे के साथ अपनी बातचीत में पहले उनके साथ बिचौलियों की स्थिति पर चर्चा की और स्वीडिश प्रधान मंत्री ने इस पर अपना वचन दिया। बाद में ओलफ पालमे रहस्यमय परिस्थितियों में मारे गए और राजीव अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए स्टॉकहोम गए। तब नए प्रधान मंत्री इंगवार कार्ल्ससन ने उन्हें बताया कि उन्होंने फ़ाइल पर अपना फैसला दर्ज किया था और अनुबंध के वित्तीय शर्तों के बारे में स्वीडिश सरकार ने बोफोर्स के लिए होवित्जर बंदूक के अनुबंध को मंजूरी दी। किसी को भी बोफोर्स से कोई धन मिले, यह विशुद्ध रूप से उस व्यक्ति और बोफोर्स के बीच एक वैध व्यापारिक सौदा था, और राजीव न तो इसके बारे में जानते थे और न ही उनका इससे कोई लेना-देना था।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के व्यापक तंत्र वाले हिंदुजा बंधुओं का भी बोफोर्स कमीशन के पैसे में हिस्सा बताया जाता है। हमारी श्रृंखला के पहले के भाग में, हमने इस कोण के बारे में विस्तार से बताया है[2]। यह बताया गया है कि स्विस अधिकारियों ने सीबीआई को अनौपचारिक रूप से कहा है कि हिंदुजा बंधुओं ने अन्य सौदों के पैसे को उसी खाते के माध्यम से प्रसारित करने की गलती की, जिसमें बोफोर्स भुगतान को स्थानांतरित किया गया था। हिंदुजा बंधुओं को चिंता है कि उनका स्विस खाता ईरान और विद्रोहियों के साथ उनके कई अवैध बंदूक सौदों का खुलासा करेगा। इसलिए, 1991 के बाद से, हिंदुजा अपील और अन्य कानूनी बाधाओं को लागू करके अपने बोफोर्स खाते की रक्षा कर रहे हैं।

इस जांच से अंतिम निष्कर्ष निकल रहा है कि सौदे में बिचौलिए दोहरे एजेंट के रूप में काम कर रहे थे; यह जांच का निर्णायक नतीजा है।

बोफोर्स घोटाले की सीबीआई जांच से मिली जानकारी के चक्रव्यूह से, एक बात स्पष्ट हो जाती है – बोफोर्स ने कमीशन के माध्यम से पैसे दिए या कुछ बिचौलियों के खिलाफ आरोपों को हटाये, जिन्होंने ऐसे सौदों में पेशेवर रूप से काम किया था और ऐसे धन के हस्तांतरण में राजीव गांधी का नाम जोड़ना उनकी छवि को धूमिल करने का एक राजनीतिक रूप से प्रेरित प्रयास है और भारतीय रक्षा सेवाओं के लिए आवश्यक हथियार की खरीद में बाधा डालने के लिए भी है।

बोफोर्स घोटाले में भुगतान के कथित प्राप्तकर्ताओं में हिंदुजा बंधु शामिल हैं। हिंदुजा बंधुओं के स्विस खाते का विवरण स्विस अधिकारियों द्वारा कागजातों की दूसरी किस्त में जारी किया गया था, लेकिन इसके बाद कोई कार्रवाई नहीं की गई। अटल बिहारी वाजपेयी वाजपेयी के हिंदुजा बंधुओं के साथ घनिष्ठ संबंधों का आनंद लिया, और कहा जाता है कि हिंदुजा बंधुओं ने वाजपेयी की छवि चमकाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर गहन प्रयास किये। वाजपेयी, हिंदुजा बंधुओं के स्वामित्व वाले द इंडस-इंड बैंक के मुंबई में उद्घाटन के अवसर पर विशिष्ठ अतिथि थे। इससे पहले वह लंदन में हिंदुजा बंधुओं द्वारा आयोजित दीवाली भोज में विशिष्ठ अतिथि थे। यह कहा जाता था कि वाजपेयी अक्सर भारत की आर्थिक नीति के निर्माण के बारे में हिंदुजा बंधुओं की सलाह सुनते थे। राजीव गांधी को बोफोर्स घोटाले में राजनीतिक रूप से दंडित किया गया, जबकि मुख्य कमीशन एजेंट, भाजपा में हिंदुजा के दोस्तों को आने वाले वर्षों में राजनीतिक रूप से लाभ हुआ

इस जांच से अंतिम निष्कर्ष निकल रहा है कि सौदे में बिचौलिए दोहरे एजेंट के रूप में काम कर रहे थे; यह जांच का निर्णायक नतीजा है। उन्होंने निश्चित रूप से लेन-देन में पैसा बनाया और फिर सुविधाजनक रूप से समय-समय पर प्रेस में चयनात्मक खुलासों का उपयोग करके राजनीतिक विरोधियों को बदनाम करने के लिए दल बदल लिया गया और अपने नए राजनीतिक आकाओं से व्यावसायिक लाभ लिया। कहानी का सार है – सत्ता में कोई भी आये, बिचौलिये और कॉरपोरेट (व्यवसायिक) घराने फलते-फूलते हैं

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

समयावधि:

24 मार्च, 1986: भारतीय सेना के लिए 155 मिमी 400 हॉवित्जर तोपों की आपूर्ति के लिए भारत और स्वीडिश हथियार निर्माता एबी बोफोर्स के बीच 1,437 करोड़ रुपये का सौदा 24 मार्च 1986 को अस्तित्व में आया।

16 अप्रैल, 1987: स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि कंपनी ने शीर्ष भारतीय राजनेताओं और रक्षा कर्मियों को रिश्वत दी है। ‘द हिंदू’ अखबार की जिनेवा स्थित पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम ने स्वीडिश रेडियो की रिपोर्ट प्रकाशित की और भारत में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया।

20 अप्रैल, 1987: राजीव गांधी ने लोकसभा को बताया कि किसी भी प्रकार की रिश्वत का भुगतान नहीं किया गया है और सौदे में कोई भी बिचौलिया शामिल नहीं है।

6 अगस्त, 1987: रिश्वत के आरोपों की जाँच के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री बी शंकरानंद की अगुआई में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन।

फरवरी 1988: भारतीय जांचकर्ता इस मुद्दे की जांच के लिए स्वीडन गए।

18 जुलाई, 1989: जेपीसी ने संसद को एक रिपोर्ट सौंपी।

नवंबर 1989: आम चुनाव में कांग्रेस की हार हुई; इसलिए, राजीव गांधी को अपना पद छोड़ना पड़ा।

26 दिसंबर, 1989: तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत के साथ किसी भी सौदे हेतु बोफोर्स पर रोक लगा दी।

22 जनवरी, 1990: सीबीआई ने भारतीय दंड संहिता के तहत आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, जालसाजी के कथित अपराधों के लिए एफआईआर दर्ज की और एबी बोफोर्स के तत्कालीन अध्यक्ष मार्टिन अर्दबो, कथित बिचौलिये विन चड्डा और हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था।

फरवरी 1990: पहला पत्राचार स्विस सरकार को भेजा गया।

फरवरी 1992: बोफोर्स घोटाले पर पत्रकार बो एंडरसन की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, जिसने बड़े पैमाने पर विवाद पैदा किया।

दिसंबर 1992: उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए मामले में शिकायत को खारिज कर दिया।

जुलाई 1993: स्विस सुप्रीम कोर्ट ने मामले में ओतावियो क्वात्रोची और अन्य आरोपियों की अपील को खारिज कर दिया। क्वात्रोची एक इतालवी व्यापारी था, जिसकी बोफोर्स घोटाले में रिश्वत के लिए माध्यम के रूप में काम करने के आपराधिक आरोपों के लिए भारत में 2009 की शुरुआत तक छानबीन की जा रही थी। उसी महीने, क्वात्रोची ने भारत छोड़ दिया और तब से वह वापस नहीं लौटा।

फरवरी 1997: क्वात्रोची के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (एनबीडब्ल्यू) और रेड कॉर्नर नोटिस (प्रत्यर्पण) जारी किया गया।

मार्च-अगस्त 1998: क्वात्रोची ने एक याचिका दायर की, जिसे सर्वोच्च न्यायालय में खारिज कर दिया गया क्योंकि उसने भारतीय अदालत में पेश होने से इनकार कर दिया था।

दिसंबर 1998: दूसरा पत्राचार स्विस सरकार को गर्नसे से और ऑस्ट्रिया से स्विट्जरलैंड में पैसे स्थानांतरण की जाँच करने के लिए भेजा गया।

22 अक्टूबर, 1999: मामले में पहला आरोप-पत्र एबी बोफोर्स के एजेंट विन चड्डा, क्वात्रोची, तत्कालीन रक्षा सचिव एसके भटनागर, बन्दूक निर्माता कंपनी बोफोर्स के अध्यक्ष मार्टिन कार्ल अर्दबो के खिलाफ दर्ज किया गया।

मार्च-सितंबर 2000: चड्ढा मुकदमे का सामना करने के लिए भारत आया और चिकित्सा उपचार के लिए दुबई जाने की अनुमति मांगी लेकिन याचिका खारिज कर दी गई। अर्दबो के खिलाफ जुलाई में एक स्पष्ट एनबीसी जारी किया गया।

सितंबर-अक्टूबर 2000: हिंदुजा भाइयों ने लंदन में एक बयान जारी किया जिसमें कहा गया था कि उनके द्वारा आवंटित धन का बोफोर्स सौदे से कोई संबंध नहीं है। हालांकि, हिंदुजा बंधुओं के खिलाफ एक पूरक आरोप पत्र दायर किया गया और क्वात्रोची के खिलाफ आरोप-पत्र दायर किया गया, क्वात्रोची ने सर्वोच्च न्यायालय से अपनी गिरफ्तारी के आदेश को पलटने के लिए कहा, लेकिन जब अदालत ने उसे सीबीआई के समक्ष जांच के लिए पेश होने के लिए कहा, तो उसने इनकार कर दिया।

दिसंबर 2000: क्वात्रोची को मलेशिया में गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में उसे इस शर्त पर जमानत मिली कि वह देश नहीं छोड़ेगा।

अगस्त 2001: भटनागर का कैंसर से निधन।

दिसंबर 2002: भारत ने क्वात्रोची के प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध किया लेकिन मलेशिया उच्च न्यायालय ने अनुरोध ठुकरा दिया।

जुलाई 2003: क्वात्रोची के बैंक खातों को सील करने के लिए भारत द्वारा यूनाइटेड किंगडम को किया गया पत्राचार।

फरवरी-मार्च 2004: कोर्ट ने स्वर्गीय राजीव गांधी और भटनागर को मामले से दोषमुक्त कर दिया और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ आईपीसी की धारा 465 के तहत जालसाजी का आरोप तय करने का निर्देश दिया। मलेशियाई सुप्रीम कोर्ट ने क्वात्रोची के प्रत्यर्पण के अनुरोध को खारिज कर दिया।

मई-अक्टूबर 2005: दिल्ली उच्च न्यायालय ने हिंदुजा बंधुओं और एबी बोफोर्स के खिलाफ आरोपों को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने एक वकील अजय अग्रवाल को अनिवार्य रूप से 90 दिनों के भीतर सीबीआई द्वारा किसी भी अपील के अभाव में उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने की अनुमति दी।

जनवरी 2006: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और सीबीआई को निर्देश दिया कि क्वात्रोची के खातों को सील करने की स्थिति सुनिश्चित करें। हालांकि, उसी दिन पैसे निकाल लिए गए।

फरवरी-जून 2007: इंटरपोल ने अर्जेंटीना के इग्वाज़ु हवाई अड्डे पर क्वात्रोची को गिरफ्तार किया। तीन महीने बाद, संघीय न्यायालय ने प्रत्यर्पण के लिए भारत के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।

अप्रैल-नवंबर 2009: सीबीआई ने क्वात्रोची के खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस वापस ले लिया और मामले को वापस लेने के लिए सर्वोच्च न्यायालय से अनुमति मांगी क्योंकि प्रत्यर्पण के लगातार प्रयास विफल हो गए थे। बाद में, अजय अग्रवाल ने एक आरटीआई अर्जी दायर की, जिसमें लंदन में क्वात्रोची के खाते को डी-फ्रीज (फिर से चालू करना) करने के दस्तावेज मांगे गए, लेकिन सीबीआई ने याचिका का जवाब देने से इनकार कर दिया।

दिसंबर 2010: न्यायालय ने क्वात्रोची की रिहाई के लिए सीबीआई की याचिका पर आदेश पलट दिया। आयकर न्यायाधिकरण ने आयकर विभाग को क्वात्रोच्चि और चड्ढा के बेटे से बकाया कर वसूलने के लिए कहा।

फरवरी-मार्च 2011: मुख्य सूचना आयोग ने सीबीआई पर सूचना रोकने का आरोप लगाया। एक महीने बाद, दिल्ली की एक विशेष सीबीआई अदालत ने क्वात्रोची को यह कहते हुए मामले से मुक्त कर दिया कि देश उसके प्रत्यर्पण पर मेहनत का पैसा खर्च नहीं कर सकता है, जिसका खर्च पहले ही 250 करोड़ रुपये हो चुका है।

अप्रैल 2012: स्वीडिश पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रॉम ने बोफोर्स के कई छिपे पहलुओं का खुलासा किया और कहा कि भारतीय अधिकारी उनसे कभी नहीं मिले। उन्होंने कहा कि स्वीडिश पुलिस के पास राजीव गांधी या पूर्व प्रधानमंत्री के करीबी मित्र अमिताभ बच्चन को बोफोर्स घोटाले में रिश्वत प्राप्त होने का कोई सबूत नहीं था। अमिताभ बच्चन का नाम पहली बार इस घोटाले में एक अखबार के माध्यम से सामने आया था, और उनके खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में उन्हें निर्दोष घोषित कर दिया गया था।

जुलाई 2013: 29-30 जुलाई, 1993 को यहां से भागकर क्वात्रोची भारत में किसी भी अदालत में अभियोजन का सामना करने के लिए कभी पेश नहीं हुआ। 13 जुलाई, 2013 को उसका निधन हो गया। अन्य आरोपी जो मर चुके हैं वे भटनागर, चड्डा और अर्दबो हैं।

1 दिसंबर 2016: 12 अगस्त 2010 से लगभग छह साल के अंतराल के बाद अजय अग्रवाल की सुनवाई हुई थी।

14 जुलाई, 2017: सीबीआई ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट और केंद्र आदेश देता है तो वह बोफोर्स मामले पर जांच को फिर से शुरू कर देंगे।

19 अक्टूबर, 2017: सीबीआई ने दावा किया कि वे बोफोर्स घोटाले के संबंध में सामने आए तथ्यों और परिस्थितियों की जांच करेंगे, जिसमें माइकल हर्शमैन द्वारा एक टीवी चैनल को एक साक्षात्कार में दी गई जानकारी भी शामिल है, जिसमें उन्होंने कई खुलासे किए और भारत में कुछ अन्य शक्तिशाली राजनेताओं का नाम सौदे से जोड़ा। माइकल हर्शमैन, जिन्होंने पहली बार बोफोर्स के कागजात पाए थे, एक गुप्त जांचकर्ता थे, जिन्हें भारत सरकार ने नियुक्त किया था।

2 नवंबर, 2018: उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2005 के फैसले के खिलाफ सीबीआई की अपील को खारिज कर दिया, जिस फैसले में राजनीतिक रूप से संवेदनशील 64 करोड़ रुपए के बोफोर्स भुगतान मामले में हिंदुजा भाइयों सहित सभी आरोपियों को रिहाई दे दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने उच्च न्यायालय के 31 मई 2005 के फैसले के खिलाफ अपील दायर करने में 13 साल की देरी के लिए सीबीआई की याचिका खारिज कर दी। इसमें कहा गया कि सीबीआई द्वारा 4500 दिनों की लापरवाही यकीन करने लायक नहीं। हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि सीबीआई अपील के सभी आधारों को उसी उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ दायर कर सकती है जो अधिवक्ता अजय अग्रवाल ने दायर किया था, जिन्होंने फैसले को चुनौती भी दी थी। शीर्ष अदालत पहले ही अग्रवाल द्वारा दायर याचिका को स्वीकार कर चुकी है।

16 मई, 2019: सीबीआई ने एक उल्लेखनीय यू-टर्न (पक्ष बदलना) लेते हुए, दिल्ली की एक अदालत से अपना आवेदन वापस ले लिया और मामले की आगे की जांच करने की अनुमति मांगी। तीस हजारी जिला अदालतों में एक अदालत के समक्ष प्रस्तुति करते हुए, जांच एजेंसी के वकील ने कहा कि एजेन्सी इस मामले में भविष्य की कार्यवाही को बाद में तय करेगी। वकील ने आगे कहा – लेकिन फिलहाल, एजेंसी मामले की आगे की जांच के लिए अनुमति नहीं चाहती। इस बीच, अधिवक्ता अजय अग्रवाल, जिन्होंने इस मामले की आगे की जाँच के लिए एक आवेदन दिया था, ने भी अपनी याचिका वापस लेने के लिए एक आवेदन दिया। लेकिन जब अदालत ने अपना समय बर्बाद करने के लिए उन पर अर्थ दंड लगाने की धमकी दी, तो अग्रवाल ने कहा कि वह इस पर बहस करेंगे। अगली सुनवाई की तारीख अभी निर्धारित नहीं है।

आगे का रास्ता: पुरानी अटल-आडवाणी नरम भाजपा के विपरीत, क्या वर्तमान नरेंद्र मोदी ने इस मामले को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा सरकार का नेतृत्व किया? क्या मोदी सरकार सीबीआई से अपना पक्ष बदलने और मामले को आगे बढ़ाने के लिए कहेगी?

संदर्भ:

[1] बोफोर्स घोटाला – गड़बड़ी की घिनौनी कहानी: जिम्मेदार कौन-कौन हैं?Sep 27, 2020, hindi.pgurus.com

[2] दफन बोफोर्स घोटाला – संस्थागत पतन, आपराधिक षड्यंत्र और एक तैयार आखिरी सिरे की दुखद कहानी, लेकिन…?Sep 25, 2020, hindi.pgurus.com

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