बोफोर्स घोटाला – गड़बड़ी की घिनौनी कहानी: जिम्मेदार कौन-कौन हैं?

बोफोर्स घोटाले में हुए भुगतान का पता लगाने के लिए सरकार के प्रयासों को किसने लगातार विफल किया!

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बोफोर्स घोटाले में हुए भुगतान का पता लगाने के लिए सरकार के प्रयासों को किसने लगातार विफल किया!
बोफोर्स घोटाले में हुए भुगतान का पता लगाने के लिए सरकार के प्रयासों को किसने लगातार विफल किया!

बोफोर्स मामले में असली छेड़छाड़ तब शुरू हुई जब 2000 में मुकदमा शुरू हुआ। 1987 में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया और इसने राजीव गांधी को राजनीतिक रूप से खत्म कर दिया, हालांकि बाद की जांच जिसने 1997 में गति पकड़ी, इसमें उनका नाम नहीं था। लाभार्थी उनके सहयोगी, करीबी पारिवारिक परिचित और निश्चित रूप से बिचौलिए और कॉरपोरेट दलाल हो सकते थे। इस श्रृंखला के पहले भाग में पीगुरूज ने शुरुआत से गड़बड़ी के बारे में बताया [1]

भाग 2 – गड़बड़ी

1997 में, स्वीडिश सरकार ने भारत को बोफोर्स मामले के बारे में दस्तावेजों से भरा एक बॉक्स प्रस्तुत किया। पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम, जिन्होंने पहली बार 1987 में स्वीडिश रेडियो के खुलासे को उजागर किया था, अन्य पत्रकारों के साथ स्वीडिश संघीय पुलिस ब्यूरो द्वारा भारतीय राजदूत को बॉक्स सौंपने के समारोह में मौजूद थे। रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस ने कई बार शिकायत की थी कि प्रधानमंत्री ए बी वाजपेयी ने उन्हें कभी भी इस बॉक्स या बोफोर्स फ़ाइलों में से किसी को छूने की अनुमति नहीं दी। क्यों? ऐसा करने से बोफोर्स रिश्वत मामले में वाजपेयी की शरण में बैठे हिंदुजा बंधुओं की भूमिका उजागर हो जाती। अब सवाल यह है कि स्वीडिश पुलिस ने जो बॉक्स सौंपा था वह अब कहां है? केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने तीन साल बाद दायर अपने आरोप-पत्र में इस बॉक्स का कभी जिक्र नहीं किया।

तीनों हिंदुजा भाइयों, श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश, को बोफोर्स घोटाले के लिए पनामा स्थित कंपनी, जिसे अलग अलग तरीके से लिखा गया है जैसे मैसर्स एमसी इनटायर कार्पोरेशन या मैसर्स मॅक इनटायर कार्पोरेशन या किसी भी नाम से एम…कार्पोरेशन, द्वारा खोले गए रहस्यमय खातों में मिली हुई राशि को अब नकारा नहीं जा सकता है

कानूनी लड़ाई

9 अक्टूबर, 2000 को सीबीआई द्वारा दिल्ली के विशेष न्यायाधीश अजीत भरिहोके की अदालत में आरोप-पत्र दायर किया गया, मीडिया जांच और अन्य दस्तावेजों और रिपोर्टों के विस्तृत 1987 अप्रैल के बाद रिकॉर्ड के साथ, दो बातें स्पष्ट होती हैं।

1. हालांकि हिंदुजा बंधुओं द्वारा “बोफोर्स मामले में भागीदारी न होने” के बारे में किए गए दावे में कोई नई बात नहीं है, बहु-आयामी दस्तावेजी साक्ष्य और जानकारी का एक ढेर उनकी भागीदारी को साबित करता है।

2. 22 अप्रैल 1987, सम्मानित स्वीडिश दैनिक समाचार पत्र डैगेन्स न्येतर (डी एन) ने एक मूल रिपोर्ट में कंपनी के उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से, बोफोर्स द्वारा 24 मार्च, 1986 के बोफोर्स-इंडिया होवित्जर अनुबंध को हासिल करने के संबंध में बोफोर्स द्वारा भुगतान किए गए “कमीशन” के प्राप्तकर्ता के रूप में हिंदुजा बंधुओं की पहचान की।

बोफोर्स-भारत अदायगी घोटाले में हिंदुजा बंधुओं की भागीदारी का पहला अकाट्य दस्तावेजी आधार हिंदूजा की कंपनी – ‘पिटको मोरेस्को’ से संबंधित छह दस्तावेजों के रूप में आया था। ‘लोटस’, ‘मोंट ब्लांक’, ‘ट्यूलिप’ खातों में कमीशन भुगतान का लेन देन है, जो लगभग एसईके 81 मिलियन है, यह 22 अप्रैल, 1988 और 25 जून, 1988 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित और विश्लेषित किया गया था। विशेष रूप से महत्वपूर्ण तीन लेनदेन दस्तावेज थे जो आपस में कड़ी बनाते हैं, 1982 और 1984 में “पिटको, c/o संगम लिमिटेड”  और “पिटको, c/o श्री जीपी हिंदुजा संगम लिमिटेड”। जून 1988 तक, स्वतंत्र मीडिया जांच ने बड़ी संख्या में आधिकारिक बोफोर्स दस्तावेजों को अधिग्रहित और प्रकाशित किया था, जो मामले की ‘समाप्ति’, ‘कोई बिचौलिया नहीं’, ‘कोई कमीशन नहीं’, ‘कोई भारतीय प्राप्तकर्ता नहीं’ जैसे शब्दों को झूठ साबित  करते थे। 1989 के अंत तक, 1987 की मार्टिन अर्दबो की डायरी प्रविष्टियों और लेखों से उल्लेखनीय सबूतों और सूचनाओं की एक बड़ी खेप, स्वीडिश पुलिस द्वारा जब्त की गयी और हिंदुजा बंधुओं के साथ ‘द हिंदू’ जांच की बातचीत से, संकट प्रबंधन और मामले को दबाने में हिंदुजा बंधुओं के प्रमुख सूत्रधार के रूप में शामिल होने का खुलासा हुआ था। वास्तव में, इन गतिविधियों ने दृढ़ता से संकेत दिया कि बोफोर्स हॉवित्जर कांड में हिंदुजा बंधुओं की भूमिका किसी की भी भूमिका से अधिक गहरी है।

इनकार, इनकार, इनकार

1990 में सीबीआई द्वारा एक नियमित आपराधिक मामला दर्ज किए जाने के बाद, सरासर इनकार की यह रणनीति जारी रही, एसपी हिंदुजा और जीपी हिंदुजा ने कथित तौर पर सीबीआई जांचकर्ताओं के सामने दावा किया कि, 1991 के अंत में, “हमारे परिवार का बोफोर्स से कोई लेना देना नहीं” और एसपी हिंदुजा ने 14 अप्रैल, 1991 को प्रकाशित एक समाचार पत्र के साक्षात्कार में मुखर होकर यहाँ तक कहा, कि “हम बोफोर्स मामले में स्विस अदालतों के समक्ष अपीलकर्ता नहीं हैं।” यह अपरिहार्य अध्याय 7 फरवरी, 1990 के पत्रावली के निष्पादन में स्विस अधिकारियों से भारत की प्रमुख आपराधिक जांच एजेंसी द्वारा दिसंबर 1997 में प्राप्त किए गए दोषी ठहराने वाले दस्तावेजों के साथ समाप्त होना चाहिए था। लेकिन आरोप पत्र से पूर्व डर के समय के दौरान, अवरोध और यहाँ तक कि वैध जाँच को भटकाने हेतु झूठ के नए संस्करणों के साथ इनकार को जारी रखा।तीनों हिंदुजा भाइयों, श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश, को बोफोर्स घोटाले के लिए पनामा स्थित कंपनी, जिसे अलग अलग तरीके से लिखा गया है जैसे मैसर्स एमसी इनटायर कार्पोरेशन या मैसर्स मॅक इनटायर कार्पोरेशन या किसी भी नाम से एम…कार्पोरेशन, द्वारा खोले गए रहस्यमय खातों में मिली हुई राशि को अब नकारा नहीं जा सकता है

तीन हिंदुजा भाइयों, जिनमें से दो यूके के नागरिक बन गए हैं और तीसरे ने कथित तौर पर स्विस राष्ट्रीयता हासिल कर ली, ने सीबीआई के समन को खारिज कर दिया और वास्तव में, कानून से खुद को बचाया है।

धोखा, आपराधिक विश्वासघात

बोफोर्स मामला, जैसा कि सीबीआई द्वारा जांच में पाया गया, आपराधिक साजिश, रिश्वतखोरी, जनता के सेवकों द्वारा आपराधिक कदाचार, धोखाधड़ी, विश्वास का आपराधिक उल्लंघन, धोखाधड़ी के उद्देश्य के लिए जालसाजी और बोफोर्स-इंडिया होविट्जर अनुबंध 24 मार्च 1986 के संबंध में वास्तविक जैसे जाली दस्तावेज़ के रूप में है। अक्टूबर 2000 में पहला आरोप-पत्र, पूर्व रक्षा सचिव, एसके भटनागर, ओतावियो क्वात्रोची, विन चड्ढा, मार्टिन अर्दबो, मैसर्स एबी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के तहत विभिन्न अपराधों के लिए दर्ज किया गया। जीपी, एसपी और पीपी हिंदुजा के खिलाफ आरोप-पत्र में आरोप लगाया गया कि “वे 1985-1987 की अवधि और उसके बाद के दौरान मार्टिन अर्दबो और अन्य के साथ आपराधिक षड्यंत्र के हिस्सेदार थे और उन्हें मैसर्स एबी बोफोर्स से कमीशन भी मिला;” स्वीडिश हथियार निर्माता ने ‘एम …’ कॉर्पोरेशन के माध्यम से एसईके 80.80 मिलियन का तीनों भाइयों को भुगतान किया; हालांकि, भारत सरकार ने होविट्जर सौदे में किसी बिचौलिए या कमीशन को स्थान नहीं दिया और बोफोर्स ने भी इस पर सहमति व्यक्त की थी, “आपराधिक साजिश के अनुसरण में, आरोपी व्यक्तियों ने बेईमानी से सरकार को यह विश्वास दिलाया कि कोई एजेंट नहीं है और सरकार को एक राशि के साथ भाग लेने के लिए प्रेरित किया जिसमें कमीशन शामिल थे, इस प्रकार सरकार को धोखा दिया गया और सरकार को नुकसानदायक सौदे में फँसा दिया।

बोफोर्स ने हिंदुजा बंधुओं को 9 भुगतान किये

पूरक आरोप-पत्र में स्पष्ट है कि सीबीआई के पेशेवर फैसले में, 1986 बोफोर्स-भारत होविट्जर अनुबंध और परिणामी भुगतान के साथ “अरब-ट्यूलिप“, “लोटस” और “मोंट ब्लैंक” कोडेड भुगतान (एसईके 37.03 मिलियन, एसईके 31.99 मिलियन और एसईके 11.77 मिलियन) को तीन हिंदुजा बंधुओं के स्विस बैंक खातों में जमा करने के प्रचुर प्रमाण हैं। बोफोर्स द्वारा मई और दिसंबर 1986 के बीच तीन कोडेड हिंदुजा खातों में किए गए नौ असतत भुगतानों के सीबीआई विश्लेषण से पता चला है कि भुगतान आकस्मिक थे और भारत सरकार द्वारा बोफोर्स को दिए गए अग्रिम भुगतान और बंदूक प्रणाली, गोला-बारूद और अन्य के वास्तविक भुगतान के साथ सटीक रूप से जुड़े हुए थे। यह प्रमाण बिल्कुल स्पष्ट है कि ये बोफोर्स अधिकारियों द्वारा भारत सरकार को बताए गए मोरसको-बोफोर्स अनुबंध में निर्धारित कुल अनुबंध मूल्य के 3 प्रतिशत कमीशन थे।

अवरुद्धि

सीबीआई के आरोप-पत्र में स्विट्जरलैंड में तीन हिंदुजा भाइयों द्वारा युद्धाभ्यास को रोकने के दस्तावेज भी शामिल हैं, जो दोहरे आपराधिक प्रावधान के तहत भारत सरकार को कानूनी सहायता प्राप्त करने से रोकने के लिए किए गए। यह जून 1998 में जीपी हिंदुजा द्वारा और अप्रैल 1999 में एसपी हिंदुजा द्वारा राष्ट्रीयता के बदलाव के महत्व पर प्रकाश डालता है; इसमें इन घटनाओं और “स्विट्जरलैंड में प्रश्नावली के निष्पादन के चरणों के बीच एक सीधा संबंध पाया गया। आरोप पत्र में कहा गया है कि तीन हिंदुजा भाइयों द्वारा इस तरह के आचरण से पता चलता है कि “मेसर्स एबी बोफोर्स के साथ साथ वे भी षड्यंत्रकारी हैं।” तीन हिंदुजा भाइयों, जिनमें से दो यूके के नागरिक बन गए हैं और तीसरे ने कथित तौर पर स्विस राष्ट्रीयता हासिल कर ली, ने सीबीआई के समन को खारिज कर दिया और वास्तव में, कानून से खुद को बचाया है। वे अपने पर्याप्त व्यावसायिक हितों और अन्य मामलों के लिए भारत आने में असमर्थ हैं, क्योंकि सीबीआई, बिना किसी संदेह के, उनके दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है और देश के कानून के तहत, जाँच हेतु जो भी कार्रवाईउचित होगी, करेगी!

और, आख़िरकार, सीबीआई ने 2008 में क्लोजर रिपोर्ट दर्ज कर बोफोर्स मामले को बंद कर दिया, जब अश्वनी कुमार निदेशक थे, जो सोनिया गांधी के बहुत करीबी थे।

भारत का कामकाज

हालाँकि, उन्होंने चतुराई से अपने चौथे भाई अशोक हिंदुजा को भारत में व्यापारिक हित को संभालने के लिए रखा है। सीबीआई के पास तीन हिंदुजा भाइयों के खिलाफ एक ‘लुक-आउट‘ (निगरानी) नोटिस भी है, जिसका अर्थ है कि अगर वे भारत आये, तो आव्रजन (इमिग्रेशन) विभाग उनके आगमन के बारे में सीबीआई को सूचित करेगा। एक बार विशेष न्यायाधीश द्वारा आरोप तय किए जाने के बाद और दृढ़ रूप से मुकदमे के शुरू होने बाद, यह व्यक्तिगत और व्यावसायिक हितों के दृष्टिकोण से भाइयों के लिए एक नया और इससे भी अधिक चिंताजनक खेल हो सकता है। आरोप तय किए जाने के बाद, हठी अभियुक्तों को कानून के सामने खुद को प्रस्तुत करने में सीबीआई की स्थिति काफी मजबूत होगी – समन, वारंट, संपत्तियों और व्यावसायिक संपत्तियों के खिलाफ कानूनी प्रतिबंधों के साथ, और प्रत्यर्पण कार्यवाही सैद्धांतिक संभावनाएं बन सकती हैं – और उच्च राजनीतिक स्थानों पर प्रभाव से दूर रहने की कीमत बहुत है, जिसका हिंदुजा बंधु आनंद लेने के लिए मशहूर हैं। यह यूपीए 1 शासन के दौरान था जब हिंदुजा बंधुओं ने दिल्ली उच्च न्यायालय में गांधी परिवार के वफादार, तत्कालीन कानून मंत्री और एक अन्य पूर्व कानून मंत्री की मदद से इस मामले को खत्म करने में कामयाबी हासिल की, वे मंत्री बाद में हिंदुजा बंधुओं के वकील बन गए। हिंदुजा बंधुओं का कांग्रेस से लेकर भाजपा तक, समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों तक, कई पत्रकारों तक सब जगह पहुंच है, जिन्होंने जानबूझकर अपनी विशिष्ट भूमिका का निर्वाह किया और केवल पहुँच से दूर विदेशी दलालों के बारे में लिखा।
इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

लेखकों ने हिंदुजा या एसी मुथैया पर गौर नहीं किया

संक्षेप में, भारतीय पत्रकारों ने अस्पष्ट, पहुँच से दूर विदेशी दलालों पर ध्यान केंद्रित किया और हिंदुजा बंधुओं और एसी मुथैया की भूमिका के आसानी से पता लगाने योग्य संबंधों पर अपनी आँखें मूंद लीं। यह कुछ हद तक भोपाल गैस त्रासदी में स्थानीय भारतीय समूह की आपराधिक लापरवाही की भूमिका को साफ सुथरा करते हुए यूनियन कार्बाइड मामले में पहुँच से दूर अमेरिकी नागरिक एंडरसन की जिम्मेदारी को उजागर करने जैसा था। और, आख़िरकार, सीबीआई ने 2008 में क्लोजर रिपोर्ट दर्ज कर बोफोर्स मामले को बंद कर दिया, जब अश्वनी कुमार निदेशक थे, जो सोनिया गांधी के बहुत करीबी थे। वह इससे पहले विशेष सुरक्षा समूह (एसपीजी) में काम करते समय सोनिया गांधी के सुरक्षा प्रभारी थे। 2008 में अश्विनी कुमार को सोनिया गांधी द्वारा पद के लिए छँटे हुए गए लोगों को दरकिनार कर अपना काम करने के लिए सीबीआई डायरेक्टर के रूप में लाया गया था, अश्विनी को उनकी अपनी परम संरक्षक सोनिया द्वारा ईनाम के तौर पर  सीबीआई से सेवानिवृति के बाद एक राज्य का गवर्नर बनाया गया।

क्रमिक सरकारों के बाद के व्यवहार ने संकेत दिया कि यहाँ छिपाने के लिए कुछ है, वे इस बात पर सहमत नहीं थे कि क्या छिपाना है। कांग्रेस क्वात्रोची को पनाह देती रही और भाजपा हिंदुजा बंधुओं को बचाने के इरादे से चल रही थी। दोनों राहें मिल गईं और न तो सच्चाई सामने आई और न ही कानून ने अपना काम किया। और जले पर नमक छिड़कने के लिए, अपराधी ने हाल ही में एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका में भारत के सड़े गले तंत्र के बारे में शिकायत की है [2]। बिचौलियों ने शासन में पारदर्शिता को नष्ट कर दिया है और पूरी व्यवस्था “दलालों” के सनक और विचारों के अनुसार काम करता है।

बोफोर्स मामले को दबाने का अधिक घिनौना विवरण कल रविवार को प्रकाशित किया जाएगा।

जारी है…

संदर्भ

[1] दफन बोफोर्स घोटाला – संस्थागत पतन, आपराधिक षड्यंत्र और एक तैयार आखिरी सिरे की दुखद कहानी, लेकिन…? Sep 25, 2020, Hindi.PGurus.com

[2] India Frustrates Two Billionaire Hinduja BrothersApr 13, 2016, The Wall Street Journal

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