पशु अधिकार: उल्लंघन हर जगह, लेकिन पेटा (पीईटीए) द्वारा केवल भारत को लक्षित किया जाता है!

भले ही हम भारतीय बाकी विश्व की तुलना में कम मांस का सेवन करते हैं, लेकिन फिर भी विशेष रूप से हिंदुओं को पेटा (पीईटीए) के हर चीज में टांग अड़ाने वाले कार्यकर्ताओं द्वारा लक्षित किया जाता है!

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भले ही हम भारतीय बाकी विश्व की तुलना में कम मांस का सेवन करते हैं, लेकिन फिर भी विशेष रूप से हिंदुओं को पेटा (पीईटीए) के हर चीज में टांग अड़ाने वाले कार्यकर्ताओं द्वारा लक्षित किया जाता है!
भले ही हम भारतीय बाकी विश्व की तुलना में कम मांस का सेवन करते हैं, लेकिन फिर भी विशेष रूप से हिंदुओं को पेटा (पीईटीए) के हर चीज में टांग अड़ाने वाले कार्यकर्ताओं द्वारा लक्षित किया जाता है!

पशु प्रेमी ईद या थैंक्स गिविंग पर चुप क्यों रहते हैं?

आज, जब मैं अपने अहाते (यार्ड) में टहल रहा था तो मैंने कुछ आश्चर्यचकित रूप से दो रीसस बंदरों ([लघुपुच्छ वानर] एक माँ और बच्चा, शायद) को मेरे पड़ोसी के घर की चहारदीवारी पर धीरे-धीरे चलते देखा। जुलाई का एक बढ़िया दिन और वुहानवायरस (कोरोनावायरस) लॉकडाउन अपने चरम पर था, मैंने उसी पड़ोसी की छत पर एक पूर्ण विकसित मोर को बैठे हुए देखा।

जब मैं एक बच्चा था, हम महल के विशाल मैदान के करीब रहते थे और तब हम बंदर को नियमित रूप से पेड़ पर झूलते हुए देखते थे और वे हमारे घर में भी घुस आते थे। हम उन्हें भगाना चाहते थे और एक बार हमने नारियल के खोल में कुछ चावल के साथ मछली करी को छिपा दिया, हम यह जानते थे कि बंदर कुछ भी मांसाहारी नहीं खाते हैं।

कई गौशालाएं हैं, हालांकि आवारा जानवरों के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता है। अवैध गौ-तस्करी और गौ-हत्या को रोकने के लिए लोग कोशिश कर रहे हैं, हालांकि ये अभी भी होते हैं।

यकीनन, एक बंदर ने चावलों को मुट्ठी में भरा, लेकिन जैसे ही उसे अपनी उंगलियों पर मछली की गंध आई, तो वह व्याकुल हो गया और उस गंध को हटाने की कोशिश करने लगा। घबराहट में उसने अपने पंजे को सीमेंट जमीन पर रगड़ना शुरू कर दिया और उसने अपने हाथ को इतनी बार रगड़ा कि उसकी चमड़ी उधड़ गई और खून निकलने लगा। हमने उस बेचारे जानवर के प्रति कितना क्रूर और अमानवीय व्यवहार किया, यह सोचकर हम हिल गए।

फिर मई में निर्बल गर्भवती हथनी, जिसके जबड़े को एक अनानास के अंदर छिपे पटाखे से उड़ा दिया गया था, गुस्से में हिंसात्मक रूप धारण करने के बजाय, वह चुपचाप नदी में चली गई और वहाँ उसने अपने जबड़े को पानी में डुबो कर अपना दर्द कम करने की कोशिश की और फिर वह अपने भ्रूण के साथ मौत के घाट उतर गई। आम लोगों से एक सहानुभूति थी, बेशक, हमेशा की तरह, अपराधी भाग गए थे[1]

चित्र 1: केरल में एक गर्भवती हथनी की मौत हो गई, उसका जबड़ा एक पटाखे द्वारा चकनाचूर हो गया
चित्र 1: केरल में एक गर्भवती हथनी की मौत हो गई, उसका जबड़ा एक पटाखे द्वारा चकनाचूर हो गया

मैं यह सब सोच रहा था जब पेटा (पीईटीए) के पाखंडी पशु-अधिकार समर्थकों, साथ ही साथ सामान्य संदिग्धों, के बारे में बात करना शुरू कर दिया कि कैसे दिवाली के पटाखे उनके कुत्तों के लिए परेशानी पैदा करते हैं।

वैसे भी, स्पष्ट रूप से, भारतीय लोग जानवरों के आदर्श पालक नहीं हैं। यदि बड़ी और बढ़ती हुई मानव आबादी द्वारा जंगली जानवरों के लिए संरक्षित क्षेत्र पर कब्जा कर लिया जाता है और कम से कम आधी आबादी मांस और मछली खाती है, हमारे पास दुनिया में सबसे अधिक मवेशी हैं, क्योंकि हम डेयरी और चमड़ा उत्पादों के बहुत बड़े उपभोगकर्ता हैं, हम संभवतः आदर्श नहीं हो सकते।

डेनिश सरकार ने 17 मिलियन मिंक (ऊदबिलाव की एक प्रजाति) की हत्या करने का फैसला किया है, यानी इन छोटे जानवरों की पूरी आबादी जो अपने फर के लिए पाली जाती है।

लेकिन हम अन्य देशों की तुलना में पशुपालन के मामले में कहीं बेहतर हैं। कई गौशालाएं हैं, हालांकि आवारा जानवरों के लिए कोई फर्क नहीं पड़ता है। अवैध गौ-तस्करी और गौ-हत्या को रोकने के लिए लोग कोशिश कर रहे हैं, हालांकि ये अभी भी होते हैं।

बिश्नोई (पर्यावरण प्रेमी समुदाय) हैं, जो एक जानवर को पीड़ित देखने के बजाय, अपने स्वयं के जीवन का बलिदान करने के लिए तैयार हैं और सामान्य रूप से हिंदुओं के पास, लैक्टो-शाकाहारी होने के लिए शास्त्रों के नुस्खे हैं। हालांकि कई  कट्टर हिंदू उनका पालन नहीं कर सकते हैं।

यदि पौधे पर आधारित मांस/ मछली/ दूध बंद हो जाता है, तो हम सभी को कम पशु पीड़ा होती है[2]। फिर भी, हिंदू, विशेष रूप से पेटा जैसे पाखंडियों द्वारा लक्षित किये जाते हैं।

ये कथित पशु प्रेमी तब बिल्कुल मौन हो जाते हैं जब लाखों जानवर ‘ईद‘ या ‘थैंक्स गिविंग‘ पर नियमित रूप से कत्ल कर दिये जाते हैं। यह शुद्ध पाखंड है, लेकिन वे जानते हैं कि हिंदुओं को हर तरह की चीजों में शर्मिंदा किया जा सकता है; उदाहरण के लिए, प्रचलित पारंपरिक ज्ञान सभी भारतीयों के दिमाग में भरा जा रहा है कि वायु प्रदूषण के वास्तविक तथ्यों की परवाह किए बिना, दिवाली पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। यह हम लंबे समय से जानते हैं।

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

वर्तमान में एक भयावह स्थिति है जो शायद पिछले हफ्ते डेनमार्क में सामने आई थी। इसने मुझे चौंका दिया। हम में से अधिकांश लोगों की स्कैंडिनेवियाई लोगों के प्रति सकारात्मक धारणा है। अफसोस की बात है कि वास्तविकता कहीं अधिक दूषित और कुरूप है, जैसा आम तौर पर होता है (चेतावनी: तस्वीरें विचलित कर सकती हैं)[3]

डेनिश सरकार ने 17 मिलियन मिंक (ऊदबिलाव की एक प्रजाति) की हत्या करने का फैसला किया है (समाचार रिपोर्टों ने हत्या की जगह एक एंटीसेप्टिक व्यंजना “कल [cull]” का इस्तेमाल किया), यानी इन छोटे जानवरों की पूरी आबादी जो अपने फर के लिए पाली जाती है। कारण यह था कि वुहानवायरस का एक उत्परिवर्ती संस्करण (म्युटेंट वरिएंट) इस प्रजाति के कुछ जानवरों में पाया गया था।

इसके बाद जो हुआ वह एक स्पष्ट त्रासदी थी। ऊदबिलाव जैसे ही छोटे जीव मिंक, उनके फर (रोयां) के लिए शिकार किए जाते हैं; उनको पाला जाता है ताकि उन्हें मारा जा सके और महिलाएं (विशेष रूप से) चिकने, मुलायम जानवर की खाल के कोट पहन सकें। यह तब है, जब फाइबर से बना नकली फर भी इसी की तरह अच्छा दिखता है।

जहां श्रेय देने की आवश्यकता है वहाँ श्रेय दिया जाना चाहिए, पेटा की ही तरह के आंदोलन ने प्राकृतिक फर को कुछ निश्चित क्षेत्रों में लगभग बंद कर दिया है, वहां नाटकीय विरोध प्रदर्शन हुए जहां लोगों ने, यदि मुझे सही से याद है, उस पर लाल पेंट फेंक कर फर को बेकार कर दिया था। तो शायद समय के साथ यह कम प्रचलित होगा फिर भी काफी सारे पालतू ऊदबिलाव उपलब्ध है (सौभाग्य से उन्हें अब जंगलों में कष्टदायी तरीके से पकड़ा नहीं जाता)।

दक्षिण भारत में अपेक्षाकृत हानिरहित जल्लीकट्टू और कंबाला और दिवाली के बारे में जोर जोर से छाती पीटने वाले सभी लोग पूरी तरह चुप थे।

आश्चर्य की बात नहीं है की (बाघ के व्यापार को याद रखें) चीन में सबसे अधिक मिंक फार्मिंग होती (लगभग 20 मिलियन) हैं, लेकिन डेनमार्क में 17 मिलियन हैं।

चित्र 2: डेनमार्क में मिंक फार्मिंग
चित्र 2: डेनमार्क में मिंक फार्मिंग

डेनमार्क में फार्मिंग किये गए मिंक। आप इन चेहरों की “हत्या करने” के लिए कैसे कह सकते हैं?

कुछ दिन पहले चौंकाने वाली खबर यह थी कि डेनिश मिंक में वुहान कोरोनावायरस म्यूटेशन (उत्परिवर्तन) हुआ था और मिंक फार्मों में मनुष्यों में संक्रमण फैलने के 11 मामले थे। डेनिश सरकार ने एहतियात के तौर पर देश में सभी 17 मिलियन मिंक को मार डालने का आदेश दिया, एक ब्रिटिश अकादमिक ने कहा:

उन्होंने कहा – “नहीं, कल (cull/दुर्बल जानवरों की हत्या) अनुचित नहीं है। मुख्य रूप से कोविड-19 से संक्रमित मिंक की संख्या के कारण। उत्परिवर्तन (म्युटेशन) वास्तव में मेरे लिए औचित्यपूर्ण नहीं था। यह कोविड-19 का बड़ा मिंक भंडार था। मैं यह भी उल्लेख करूंगा कि मिंक नियमित रूप से बच जाते हैं, इसलिए मैं ऐसा नहीं चाहता कि जंगली जानवरों की आबादी को संक्रमित करने का जोखिम उठाया जाए।

मुझसे शायद भूल हो गयी हो, लेकिन मैं बता सकता हूं कि अभी तक पेटा या किसी अन्य पशु अधिकार संगठन की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। दक्षिण भारत में अपेक्षाकृत हानिरहित जल्लीकट्टू और कंबाला और दिवाली के बारे में जोर जोर से छाती पीटने वाले सभी लोग पूरी तरह चुप थे।

यही इनकी वास्तविकता है, जब चीन ने एक अफ्रीकी स्वाइन फ्लू महामारी के बाद अपने सूअरों को जिंदा जला दिया था तब ये पशु प्रेमी गहरी चुप्पी साधे बैठे थे[4]। (चेतावनी: तस्वीरें और आवाजें विचलित कर सकती हैं)। द गार्डीअन का दावा है कि 200 मिलियन सूअर थे[5]:

“मार दिया (Culled), हत्या कर दी या चीन में इस बीमारी से मारे गए।”

न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, ये संख्या चौकाने वाली थी, दुनिया के 25% सूअर, लेकिन बहुत अधिक नाराज़गी नहीं और न ही बड़े विरोध प्रदर्शन हुए[6]

यूएस एनपीआर के अनुसार, डेनमार्क में ऑपरेशन पूरी तरह से विफल रहा, क्योंकि इसके लिए कोई कानूनी प्रावधान नहीं था और कृषि मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा[7]:

डेनमार्क के प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने भी इस हफ्ते की शुरुआत में माफी मांगी और कहा कि सरकार को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि उसके फैसले का कोई कानूनी आधार नहीं है। एसोशियेटेड प्रेस के अनुसार मेटे ने कहा – “मेरा मकसद कानून की अवहेलना करना नहीं था।”

फिर भी, डेनमार्क के 17 मिलियन फार्मिंग किये गए मिंक, जो उनके फर के लिए पाले जाते हैं – की हत्या (cull) जारी है और यह प्रक्रिया गुरुवार आधी रात तक पूरी होनी चाहिए। [ईडी: 26 नवंबर]”

बेचारे कई मृत जीवों के हृदय को आघात पहुँचाने वाले दृश्य हैं, जैसे कई टुकड़े पड़े हों।

चित्र 3: डेनमार्क में मिंक की हत्या
चित्र 3: डेनमार्क में मिंक की हत्या

यह सिर्फ पारंपरिक हिंदू ज्ञान को दर्शाता है कि हम सभी इस में एक साथ हैं; यदि हम खुद को एक कुरसी पर बैठाएं, जैसा कि अब्राहमिक करते हैं, तो चीजें जल्दी से उत्तेजित हो सकती हैं। कहा जाता है कि वुहान कोरोनावायरस जानवरों से मनुष्यों में प्रेषित हुआ है।

जरा सोचिए, अगर लोगों के प्रस्तावित सामूहिक टीकाकरण के बाद भी अलग-थलग पड़े इलाकों में बड़े जनसमूह कोरोनावायरस से ग्रसित हों तो क्या होगा? क्या हम संक्रमित लोगों को भी मौत के घाट (cull) उतार देंगे, जैसे हमने मिंक के साथ किया?

ध्यान दें:
1. यहां व्यक्त विचार लेखक के हैं और पी गुरुस के विचारों का जरूरी प्रतिनिधित्व या प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

संदर्भ:

[1] When A Pregnant Elephant Dies After Days In AgonyJun 05, 2020, NDTV

[2] Generating Meat In Labs: The Technology, Opportunities And The ConsequencesNov 6, 2017, Swarajyamag

[3] Denmark dumps 17 million minks into mass graves over fears mutated strain of Covid 19 could torpedo vaccine breakthroughNov 10, 2020, Mirror

[4] Pigs Burned Alive in China: How Meat Farms are Killing Pigs in China – Kinder World

[5] Animals farmed: China swine flu fears, Nigeria pig cull and permits for mega-dairyJul 14, 2020, The Guardian

[6] Why Did One-Quarter of the World’s Pigs Die in a Year?Jan 1, 2020, NY Times

[7] Danish Agriculture Minister Resigns Amid Criticism For Ordering Mink CullNov 19, 2020, NPR

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