निम्न स्तर पर, बेतरतीब देश भर में फैली, बिना रुके होती हिंसा (आरयूएलएलएस): जिहाद का सबसे घातक हथियार

कोई भी सेना या पुलिस निम्न स्तर पर, बेतरतीब, देश भर में फैली, लेकिन बिना रुके, होती हिंसा का मुकाबला नहीं कर सकती। कोई भी समाज हर घर पर पुलिस की एक चौकी का भार नहीं उठा सकता। कोई भी ऐसे आरयूएलएलएस समाज में रहना पसंद नहीं करेगा।

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कोई भी सेना या पुलिस निम्न स्तर पर, बेतरतीब, देश भर में फैली, लेकिन बिना रुके, होती हिंसा का मुकाबला नहीं कर सकती। कोई भी समाज हर घर पर पुलिस की एक चौकी का भार नहीं उठा सकता। कोई भी ऐसे आरयूएलएलएस समाज में रहना पसंद नहीं करेगा।
कोई भी सेना या पुलिस निम्न स्तर पर, बेतरतीब, देश भर में फैली, लेकिन बिना रुके, होती हिंसा का मुकाबला नहीं कर सकती। कोई भी समाज हर घर पर पुलिस की एक चौकी का भार नहीं उठा सकता। कोई भी ऐसे आरयूएलएलएस समाज में रहना पसंद नहीं करेगा।

नोट: शब्द आरयूएलएलएस (बेतरतीब बिना रुके निम्न-स्तरीय होती हिंसा) को Nimittekam.org के डॉ ओमेंद्र रत्नु ने गढ़ा था।

दक्षिण अफ्रीका में 1911 में गोरे 22% और 1980 में 16% थे। अब वे सिर्फ 4% हैं, और एक दशक के भीतर उनके पूरी तरह गायब होने की उम्मीद है।

सेना दुश्मन सेना के खिलाफ सीमाओं की रक्षा कर सकती है। पुलिस एक ऐसे समाज में व्यवस्था रख सकती है जहां हर कोई समान नैतिक संहिता का पालन करता है। नैतिक संहिता के उल्लंघन होते हैं, लेकिन वे ज्यादातर जुनून, क्रोध, मानसिक गिरावट के अपराध हैं। संगठित अपराध हो सकता है, लेकिन ऐसे अपराधी सुनिश्चित करते हैं कि गिनती को उस स्तर तक न बढ़ाएं जो जनता का ध्यान आकर्षित करे।

तो क्या होता है जब एक समाज में सभी समूह समान नैतिक संहिता का पालन नहीं करते हैं? जब कोई समूह सोचता है कि यह नैतिक है, यहां तक ​​कि धार्मिक भी है, कि त्वचा के रंग, धर्म, या भाषा, या जातीयता के आधार पर दूसरे समूह को मारना, बलात्कार करना, या लूटना?

उत्तर: जो समूह ऐसे समूह का लक्ष्य है उस समाज से उसका पूरी तरह से गायब होना बस कुछ ही समय की बात है।

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

गोरे दुनिया पर राज करते हैं। उनके पास इसकी अधिकांश संपत्ति, इसकी सबसे अच्छी सेनाएँ, इसके सबसे अच्छे देश हैं। क्या वे दक्षिण अफ्रीका के गोरों को बचाने में सक्षम हैं? नहीं, क्योंकि कोई भी सेना या पुलिस निम्न स्तर पर, बेतरतीब, देश भर में फैली, लेकिन बिना रुके, होती हिंसा का मुकाबला नहीं कर सकती। कोई भी समाज हर घर पर पुलिस की एक चौकी का भार नहीं उठा सकता। कोई भी ऐसे समाज में रहना पसंद नहीं करेगा।

इसलिए ऐसे समूह भाग जाते है। दक्षिण अफ्रीका के गोरे, हिंदू कश्मीर से, कैराना से, मेवात से।

वे भागते रहते है लेकिन दुनिया ऐसे नैतिक संहिता पर सवाल उठाने के लिए तैयार नहीं है जो पूरे धार्मिक या नस्लीय समूहों को ऐसी आपराधिकता की अनुमति देता है।

ऐसे सवाल मीडिया द्वारा, लोकप्रिय संस्कृतिकि संगठनो द्वारा, विद्वानों द्वारा किये जाते है। लेकिन ये सभी श्रेणियां अब पूरी तरह से वामपंथी हैं। इसलिए, दक्षिण अफ्रीका पर शासन करने वाले वामपंथी कहते हैं कि गोरों को मारना नैतिक है, लेकिन जब ऑस्ट्रेलिया ने दक्षिण अफ्रीका के गोरों के लिए सामूहिक शरण का प्रस्ताव रखा, तो ऑस्ट्रेलिया के वामपंथियों ने कहा कि ऐसा करना नस्लवादी होगा!

तो, कश्मीर, कैराना, और मेवात से हिंदुओ को भगाया जाता है, लेकिन भारत में वामपंथी जोर देकर कहते हैं कि कश्मीर, कैराना और मेवात में जिन लोगों ने उन्हें भगाया है, वे पीड़ित हैं, और जिनको भगाया गया है वे अत्याचारी हैं।

अगर आपको लगता है कि सेना, या पुलिस, या संयुक्त राष्ट्र (यूएन), या पश्चिमी देश आपको बचाएंगे, तो दक्षिण अफ्रीका के गोरों के बारे में सोचें। केवल सच्चाई जानने और इसके बारे में कुछ करने से आप बच पाएंगे। और अगर आपको लगता है कि आपके जीवन के समय में ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है, तो याद रखे, गोरे 1994 में दक्षिण अफ्रीका में सत्ता में थे।

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