कोविड की भयानक दूसरी लहर – भारत के साथ क्या गलत हुआ?

भारत के कोविड प्रबंधन के साथ जो गलती हुई, उस पर एक आलोचनात्मक नज़र!

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भारत के कोविड प्रबंधन के साथ जो गलती हुई, उस पर एक आलोचनात्मक नज़र!
भारत के कोविड प्रबंधन के साथ जो गलती हुई, उस पर एक आलोचनात्मक नज़र!

कोविद की दूसरी लहर अराजकता में बदल गई

पिछले दो हफ्तों से, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत, अकेले अप्रैल 2021 में ही 30,000 से अधिक मौतों और लगभग 30 लाख रोगियों के साथ कोविड-19 दूसरी लहर की भयानक स्थिति का गवाह बना हुआ है। ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति, दवाओं की तीव्र कमी और 24×7 जलते श्मशान की अराजकता के साथ रोगियों से भरे अस्पतालों से चौंकाने वाले दृश्य सामने आ रहे हैं। भारत के साथ क्या गलत हुआ, जो कुछ हफ्ते पहले छाती ठोक रहा था और 60 से अधिक को देशों टीके निर्यात कर रहा था? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहां तक कि कोरोना के खिलाफ युद्ध में जीत का घमंड तक कर गए थे! इसका सरल उत्तर यह है कि नवंबर 2020 से, भारत ने महामारी को हल्के में लिया और कई लोगों ने सोचा मामला शांत हो गया जैसे कि समुद्र के किनारे खेल रहा बच्चा सामने से आने वाली मजबूत छिपी लहर को कम करके आंकता है।

नवंबर 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से हमने सभी कोविड-19 नियमों का उल्लंघन करते हुए बड़े पैमाने पर चुनाव प्रचार देखा है। फरवरी 2021 तक, जब कोविड के दैनिक मामले देश भर में कुल 6000 रोगियों से नीचे चले गए, सभी विशेष रूप से निर्मित कोविड देखभाल केंद्र बंद हो गए, और देश में टीकाकरण का उत्सव देखा जा रहा था। लेकिन आंकड़े बताते हैं कि आज की तारीख में, भारत ने केवल 14.52 करोड़ (145 मिलियन) का ही टीकाकरण किया है और इसमें से केवल 2.26 करोड़ (22 मिलियन) ही पूर्ण रूप से (दूसरी खुराक) टीकाकरण किए गए हैं। यह भारत जैसे 136 करोड़ (1.36 बिलियन) से अधिक आबादी वाले देश में बहुत कम टीकाकरण कवरेज है। अब मोदी को मार्च 2021 तक 60 देशों में 6.6 करोड़ (66 मिलियन) से अधिक वैक्सीन खुराक के निर्यात के लिए कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उस समय देश में केवल 4 करोड़ (40 मिलियन) लोगों को ही टीका लगाया था। अब कई लोग दूसरी खुराक के लिए वैक्सीन की कमी का सामना कर रहे हैं और यह स्थिति तब और गंभीर हो सकती है जब देश 18 वर्ष से अधिक उम्र के सभी लोगों के लिए टीकाकरण शुरू करने जा रहा है।

 

कई राज्य और केंद्र अलग-अलग उच्च न्यायालयों में तीखी लड़ाई में लगे हुए हैं और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में तीव्र ऑक्सीजन आपूर्ति, अस्पतालों और चिकित्सा आपूर्ति में बुनियादी ढांचे की कमी के मुद्दे को उठाया है। हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि राज्यों और केंद्र के बीच तालमेल की कमी है और दिल्ली, महाराष्ट्र, पंजाब जैसे विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में स्थिति और बदतर है। कुछ भाजपा शासित राज्य जैसे कि गुजरात यानी प्रधानमंत्री का गृह राज्य भी खराब स्थिति में है।

इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

कोविड नियमों को मार्च-अप्रैल में दरकिनार कर दिया गया जब पांच राज्यों – पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव होने थे। प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सहित कई राजनेता उग्र चुनाव प्रचार अभियान में सबसे आगे थे और सैकड़ों रैलियां की गईं। संक्षेप में, प्रणाली, सरकारों और सार्वजनिक रूप से एक लापरवाह व्यवहार के अलावा, जब भारत ने परीक्षण और ट्रैकिंग बढ़ाने का फैसला किया तब एजेंसियों के बीच तालमेल की कमी थी। यह स्वाभाविक है कि जब परीक्षण और ट्रैकिंग बढ़ेगी, तो अधिक रोगी मिलेंगे। लेकिन मरीजों का प्रबंध करने के लिए अस्पताल और चिकित्सा बुनियादी सुविधाओं को अपग्रेड नहीं किया गया। इतना ही नहीं, फरवरी 2021 तक कई कोविड केयर सेंटर बंद हो गए!

अब हम हर जगह अराजकता देख रहे हैं। भारत में नीति निर्माण में अति-केंद्रीकरण जैसी प्रणालीगत समस्याएं हैं। कोविड के समय में प्रधान मंत्री और उनका कार्यालय केंद्रीय रूप से सनसाधन का संचालन कर रहा था। लेकिन केंद्रीकरण अब गलत साबित हो गया है और विकेंद्रीकरण ही दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और 136 करोड़ से अधिक आबादी वाले भारत में मामलों को संभालने का एकमात्र तरीका है। आइए हम आशा करें और कामना करें कि भारत इस कोविड की दूसरी लहर के संकट से भी उबर आये

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