63 मून्स ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में एमपीआईडी (MPID) केस जीता; कोर्ट का आदेश एनएसईएल एक वित्तीय प्रतिष्ठान नहीं है

    चिदंबरम और सी-कंपनी के एक अन्य शैतानी कथानक को बॉम्बे हाई कोर्ट के द्वारा नष्ट कर दिया गया है आदेश दिया कि एनएसईएल एक वित्तीय संस्थान नहीं है

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    63 मून्स बॉम्बे उच्च न्यायालय में एमपीआईडी (MPID) केस जीता; कोर्ट का आदेश एनएसईएल एक वित्तीय प्रतिष्ठान नहीं है
    63 मून्स बॉम्बे उच्च न्यायालय में एमपीआईडी (MPID) केस जीता; कोर्ट का आदेश एनएसईएल एक वित्तीय प्रतिष्ठान नहीं है

    जिग्नेश शाह और 63 मून्स को अदालत में अपना पक्ष रखने का मौका मिला और एक महत्वपूर्ण लड़ाई जीती। बॉम्बे हाई कोर्ट ने आज फैसला सुनाया कि नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड (एनएसईएल), एक वित्तीय प्रतिष्ठान नहीं है और इसलिए एमपीआईडी अधिनियम के तहत बैंक खातों और संपत्तियों सहित कंपनी की संपत्ति की कुर्की के लिए अधिसूचना रद्द हो गई। सक्षम प्राधिकारी ने रोक लगाने (stay) का अनुरोध किया। हालांकि, माननीय उच्च न्यायालय ने नकार दिया।

    यह महत्वपूर्ण क्यों था?

    एक प्रशासनिक धोखे (उच्च न्यायालय के अनुसार) में, महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटरेस्ट ऑफ डिपॉजिटर्स (एमपीआईडी) अधिनियम को एनएसईएल पर लागू किया गया था, जो एक वित्तीय संस्थान नहीं है। एमपीआईडी अधिनियम केवल वित्तीय संस्थानों पर लागू होता है और एनएसईएल एक वस्तु विनिमय संस्थान है, जहां इच्छुक खरीदारों और विक्रेताओं के बीच वस्तुओं का व्यापार होता है। 63 मून्स ने रुख बनाए रखा था कि यह अधिनियम एनएसईएल के लिए लागू नहीं होता और उनके रुख को आज उच्च न्यायालय परिणाम द्वारा निर्धारित किया गया है। इसका मतलब है कि 63 मून्स की सभी संपत्तियां जो कुर्क की गई थीं, उन्हें अब स्वतंत्र किया जाएगा।

    एनएसईएल ने कभी जमा राशि स्वीकार नहीं की

    अपने फैसले में, जस्टिस रंजीत मोरे और भारती डांगरे की एचसी बेंच ने कहा कि एनएसईएल ने किसी भी जमा राशि को स्वीकार नहीं किया है और यदि उसने कोई जमा राशि को स्वीकार नहीं किया है, तो वह ‘वित्तीय प्रतिष्ठान’ की परिभाषा में नहीं आएगा। अदालत इस निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले एनएसईएल के विभिन्न उप-कानूनों से गुजरी।

    इस खबर को अंग्रेजी में यहाँ पढ़े।

    चिदंबरम द्वारा एक और संदिग्ध कृत्य?

    पी चिदंबरम के वित्त मंत्री रहते अरविंद मायाराम की अध्यक्षता वाली जल्दबाजी में गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर कार्रवाई (जैसे एमपीआईडी अधिनियम लागू करना) की गई थी। उस समय, महाराष्ट्र सरकार कांग्रेस के अधीन थी। चिदंबरम ने जिग्नेश शाह और उनकी कंपनियों के समूह को क्यों निशाना बनाया, इसके कारणों को मेरी श्रृंखला सी-कंपनी में बहुत विस्तार से बताया गया है [1] । व्यक्त आ गया है कि सरकार सी-कंपनी के चापलूसों से कार्यवाही करे जो अपने पद से चिपके हुए हैं और सत्य के मार्ग पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।

    यहाँ 63 मून्स प्रेस रिलीज की एक प्रति है:

    63 Moons Wins MPID Case by PGurus on Scribd

    संदर्भ:

    [1] Questions ED and CBI should be asking of C-Company minionsJul 12, 2018, PGurus.com

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