मोदी ने संकट को टालने के लिए आर्थिक उपायों का लिया प्रत्यक्ष प्रभार

वे अधिकारी जो चाहते हैं कि नियामक व्यवस्था की सफाई की जाए उनका कहना है कि रुपये के लघु विक्रेताओं को पहचाना और उनके खिलाफ कार्यवाही करना आसान है।

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मोदी ने आर्थिक संकट को टालने के लिए खुद संभाला प्रभार
मोदी ने आर्थिक संकट को टालने के लिए खुद संभाला प्रभार

मोदी और जेटली से यह उम्मीद की अर्थव्यवस्था को उन लोगों से बचाने के लिए नीतियाँ बनाने की जरूरत है जो जल्द से जल्द पैसे कमाना चाहते हैं एवँ वे जो भारत के विकास को रोकना चाहते हैं।

नरेंद्र मोदी ने आर्थिक संकटों की वजह से भारतीय जनता पार्टी की बिगड़ती छवि को संभालने के लिए उन नीतियों का प्रत्यक्ष प्रभार लिया जिससे अस्थिरता को हटाकर भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास लाया जा सकता है। अधिकांश केंद्रीय अधिकारियों ने, जो ईमानदार एवँ सार्वजनिक कल्याण के लिए समर्पित है, इस बात का स्वागत किया है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री ने सही समय पर हस्तक्षेप किया है। रुपये को मजबूत बनाने वाले आर्थिक मूलतत्त्वों को सुधारने के बावजूद भारतीय मुद्रा का प्रदर्शन एशिया में सबसे खराब रहा है।

अधिकारी (कुछ सेवानिवृत्त), जिन्होंने 2013 में पिछले सरकार के प्रमुख नेता के नेतृत्व में काम कर रहे गुप्त गुट द्वारा रुपये का लघुकरण (मूल्य कम करना) करवाया जा रहा था, बताते हैं कि वही गुट अभी मुद्रा बाजार में सक्रिय है। वे चाहते हैं कि दिसम्बर तक रुपया 100 प्रति डॉलर हो जाए, एक लक्ष्य जिसे वे प्राप्त करने की कगार पर है। अच्छे संसाधनों वाले इस गुट को “सत्ता बाजार में विक्रय आगामी मुद्रा” क्रियाविधि से मदद मिल रही है जिसे यूपीए द्वारा प्रबल किया गया और जिसे बेवजह 26 मई 2014 के बाद भी प्रचालन में रखा गया। क्योंकि इस गुट के व्यवसायिक पत्रकारों के साथ अच्छे संबंध है, ये आसानी से (मीडिया द्वारा) जनसमुदाय में यह बात फैलाने में सफल हुए हैं कि रुपया तेजी से गिर रहा है।

वे अधिकारी जिन्होंने इस गुट का साथ नहीं दिया बताते हैं कि जितनी जल्दी सत्ता बाजार में विक्रय आगामी मुद्रा पर पाबंदी लगा दी जाए उतनी ही रुपए की स्थिरता के लिए बेहतर होगा। उनका कहना है कि यूपीए के 10 वर्षो के कार्यकाल में कई ऐसी नीतियाँ बनायी गयी जिससे अंतरराष्ट्रीय निधि प्रबंधकों को भारतीय बाजारों से पैसे कमाने में आसानी होगी और कई सारी नीतियाँ अब भी नॉर्थ ब्लॉक द्वारा प्रचलित हैं क्योंकि उस समय के मुख्य अधिकारी अब भी महत्वपूर्ण पदवियों पर विराजमान हैं। जाँच एजेंसियों को यह पता करना आसान होगा कि कौनसी दलाली एवँ वित्तीय कंपनियां वर्तमान में किए जा रहे रुपये के लघुकरण में सहभागी हैं, खासतौर पर सिंगापुर, दुबई, लंदन एवँ न्यू यॉर्क द्वारा, हालांकि ये केंद्र रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के कार्यक्षेत्र के बाहर है। आरबीआई इस मामले में कोई शीघ्रता नहीं दिखा रही है। अब तक, आरबीआई के नेतृत्व ने रुपये को लेकर कोई आश्वासन भी नहीं दिया है।

कई अधिकारी स्वयं इस गुट के लिए काम कर सकते हैं, नीतियों को इस प्रकार तोड़कर, जिससे उनके गुप्त संरक्षकों को लाभदायक हो।

धारणाओं की तिकड़म

साथ ही, कुछ लोगों एवँ लेखों द्वारा यह प्रदर्शित किया जा रहा है कि अभी चल रहे कम भावों में भी रुपये का अधिमूल्यन किया गया है। दिल्ली में स्थित जन वित्तपोषित आर्थिक प्रबुद्ध मंडल इस कोशिश में लगा है कि मुद्रा बाजार में भगदड़ मचाई जाए ताकि रुपये को नुकसान हो। व्युत्पन्न व्यापार जैसे विघटनकारी तंत्रों को अब तक ना रोका गया है और ना ही विनियमित किया गया है यह इस बात का प्रमाण है कि रुपये का लघुकरण करनेवाली इस गुट की पहुंच दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक एवँ मुंबई के मिंट रोड में कहाँ तक है। नीतियों एवँ नीति कर्ताओं पर धारणाओं के तिकड़म का उदाहरण यह है कि किस तरह यह बताने की कोशिश की जा रही है कि 2008 में भारत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट से 2008-09 में हुए स्वस्थ संचालन की वजह से बच गया।

वास्तविकता यह है कि भारत में संपत्ति की खरीदी अधिकतर नकद राशि में की गई जिससे संस्थागत उधारदाताओं को मूल्यांकन में प्रतिरोधी प्राप्त हो गयी और इस तरह देश में कोई वित्तीय संकट सामने नहीं आया। इसके पश्चात वित्तीय प्रोत्साहन के नाम पर नकद राशि उन क्षेत्रों में बेतहाशा लगायी गयी जिससे उस समय एनपीए जैसे रोग फैलने लगे। धारणाओं के कुशल प्रबंधन से इस गिद्धों के गुट ने यह सुनिश्चित किया कि उनकी कई सारी विषाक्त नीतियाँ अब भी चल रही हैं। उदाहरणार्थ, एक राष्ट्र की मुद्रा उतनी ही कीमती है जितना कि खाने का पदार्थ एवँ अन्य आवश्यक वस्तुएं जिनका वायदा बाजारों में व्यापार नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये अस्थिरता पैदा करेंगे एवँ इससे अप्रत्याशित लाभ उत्पन्न होंगे।

याद दिला दें कि सट्टेबाज़ एवँ सत्ता परिवर्तन विशेषज्ञ जॉर्ज सोरॉस ने उसी तरह लघुकरण का उपयोग करके ब्रिटिश पाउंड की कीमत को गिराया जिस तरह अब रुपये को गिराया जा रहा है। सोरॉस ने मलेशियाई रिंगिट पर भी निशाना साधा था। हालांकि इसे मूर्त सबूतों के साथ साबित करना कठिन होगा, परंतु अधिकारी जो रुपये को गिराने की प्रक्रिया से घबराहट में है, उनका कहना है कि सोरॉस का संगठन (जिसकी भारत में कई प्रकट और गुप्त शाखाएं हैं) भारतीय रुपये को गिराने में सक्रिय है न केवल मुनाफा कमाने बल्कि ईरान के साथ व्यापार जारी रखने के लिए भारत को दंडित करने के लिए भी। दिलचस्प बात यह है कि सोरॉस स्वयं गलत ख़बरों का शिकार है जो उसे ईरान के सरकार का करीबी बताते हैं जबकि वह वास्तव में उनका धुर विरोधी है।

अविराम निगरानी की आवश्यकता

अंतरराष्ट्रीय सट्‍टेबाज एवँ राजकोषीय और मौद्रिक नीति-कर्ताओं के बीच अनौपचारिक संबंध ही नियामक एवं निगरानी तंत्रों में अस्पष्ट बिंदु है। जबकि अधिकारी छोटे खिलाड़ियों के पीछे पड़े हैं, बड़े शिकारी बच निकलते हैं। विजय मल्ल्या ने उसके द्वारा लिए गए ऋणों को एक निजी बैंक के माध्यम से विदेशी खाते में स्थानांतरित किया जिसका वर्तमान परिवेश में गहरा संबंध है। परंतु, यह और ऐसे “सम्मानजनक” संस्थाओं पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई, शायद इस वजह से कि यह संस्थाएं अब भी उन लोगों की मदद कर रही हैं जो उनसे 2014 के भाजपा के विजय के पश्चात भी जुड़े हुए हैं।

अधिकारी, जो इस बात से चिंतित हैं कि ऐसे दुष्ट तत्वों पर कार्यवाही नहीं की जा रही है, का कहना है कि सत्ता बाजार में विक्रय आगामी मुद्रा के माध्यम से किए जाने वाले भुगतानों की दृढ़ता पर अविराम निगरानी की आवश्यकता है। यदि व्यापार दृढ़ नहीं है तो वे सट्टेबाज जिनके पास अंदरूनी जानकारी है कि भारत के राजकोषीय और मौद्रिक अधिकारी तनाव और अस्थिरता की स्थिति में किस तरह की कार्यवाही करेंगे वे इस बात का लाभ उठाएंगे जिससे बाजार को कठिनाइयाँ होंगी। कई अधिकारी स्वयं इस गुट के लिए काम कर सकते हैं, नीतियों को इस प्रकार तोड़कर, जिससे उनके गुप्त संरक्षकों को लाभदायक हो।

दुर्भाग्यवश, भारत की उच्चतर नौकरशाही, ऐसे अंतर्ध्वंसक नजर से छुपे रहते हैं और दंड से बच जाते हैं क्योंकि वे विनियामक और निरीक्षण विभागों और एजेंसियों में भी शामिल हैं। सीबीआई, ईडी, डीआरआई जैसी एजेंसियों के निर्यात और आयात में चल रहे झूठी चालान-प्रक्रिया जैसे कदाचार के खोज का अभिलेख निराशाजनक है, परंतु अब तक भाजपा के नेतृत्व में चल रही सरकार ने उन अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के खिलाफ कार्यवाही नहीं की, जिन्होंने खुलेआम विजय मल्ल्या एवँ अन्य लोगों को भारत के बाहर धनराशि को स्थानांतरित करने में मदद की। शायद ऐसी कार्यवाही उन कार्यवाहियों की सूची में रखी गई है जो 2022 में की जाएगी।

दुर्भाग्यवश, कई सारे अधिकारी ऐसी संस्थाओं का समर्थन करते हुए उन नीतियों को बढ़ावा देते हैं जिससे उनका लाभ हो और घरेलू नीतियों का नहीं।

एक अन्य समस्या क्षेत्र एनडीएफ (गैर प्रदेय अग्रिम) बाजार है जो सिंगापुर एवँ दुबई में चल रहे हैं। इस बाजार का भारतीय पासपोर्ट रखने वाले लोगों (जिसमें रहस्मय दूसरा पासपोर्ट रखने वाले भी शामिल हैं) में से कई लोग उपयोग करते हैं जिनका अंतरराष्ट्रीय संचालन है। ये भारत के फोरेक्स बाजार में एक स्थिति एवँ साथ ही एनडीएफ में विरोधी स्थिति लेते हैं। स्थिति से चिंतित ईमानदार अधिकारियों का कहना है कि इस तंत्र का उपयोग अब रुपये के लघुकरण में किया जा रहा है। याद दिला दें कि एक पूर्व वित्तमंत्री ने भारतीय वस्तु विनिमय, जिसकी दुबई एवँ सिंगापुर में शाखाएँ थीं, को नष्ट कर दिया और वही प्रक्रिया अब भी उन अधिकारियों द्वारा चलायी जा रही है जो पूर्व मंत्री के निकट होने के पश्चात् भी ऊंचे पदों पर है या जिनसे ये सरकार नियमित रूप से विचार-विमर्श करती है, ये जानते हुए भी कि वे उस पूर्व मंत्री से संबंधित हैं जिसने बाजार छल योजना से ढेर सारा लाभ कमाया।

अंतरराष्ट्रीय अनुशंसा से बचें

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वित्त मंत्रालय का नियंत्रण फिर से अरुण जेटली को सौंप दिया है, जिनके पास 20 घंटे प्रति दिन का कार्य ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि रुपया अपने सही मुल्य पर लौटे एवँ रुपये का लघुकरण करने और अर्थव्यवस्था के लिए विपरीत परिस्थितियां पैदा करने के इच्छुक सट्टेबाजों द्वारा लाई गई अनिश्चितता और अस्थिरता को समाप्त करें। इन परिस्थितियों में जब आरबीआई नेतृत्व (जिसका 2016 के नोटबंदी के दौरान तरलता प्रबंधन सही नहीं था) संकटकाल में चुप्पी साधे है, वे लोग जो रुपये पर भरोसा करते हैं और प्रधानमंत्री मोदी के प्रबंधन कौशल पर विश्वास करते हुए उनकी ओर वित्त मंत्रालय के माध्यम से दर्शनीय और ऊर्जावान नेतृत्व चाहते हैं।

आवश्यकता है कि दीर्घ-प्रबंधन में स्थिर रहें एवँ निष्क्रियता और अनिर्णय ना दर्शाएं। लीरा, रीयाल, रेंड और पेसो भी उबरते बाजार संकटों की वजह से लगातार गिर रहे हैं, भारत की भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक परिस्थितियां अधिक अनुकूल हैं, खासतौर पर इस वजह से कि प्रधानमंत्री मोदी ने लड़ते महाशक्ति यूएस एवँ चीन के साथ संबंधों को संतुलन में रखा है। नॉर्थ ब्लॉक एवँ आरबीआई के पास सट्टेबाजों द्वारा निर्माण किए जानेवाले संकटों से उबरने की क्षमता है।

वे आयात को कम कर सकते हैं एवँ देशभक्त एनआरआई समूह से 2013 की तरह ऋणपत्र खरीदने का अनुरोध कर सकते हैं। उन देशवासियों के लिए, जिनके पास विदेशों में अपूर्व संपत्ति है, उचित दरों में कराधान, ना कि पहले जैसे निषेधात्मक दर, अपराध-क्षमा योजना लायी जा सकती है। एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि प्रधानमंत्री को अलग सोचवाले उपाय लाने होंगे और खासतौर पर अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए नीतियों से बचना होगा क्योंकि उनका उदेश्य केवल स्वयं का लाभ है और वो भी अपने राष्ट्र के उत्पादकों और उपभोक्ताओं की कीमत पर। दुर्भाग्यवश, कई सारे अधिकारी ऐसी संस्थाओं का समर्थन करते हुए उन नीतियों को बढ़ावा देते हैं जिससे उनका लाभ हो और घरेलू नीतियों का नहीं और प्रधानमंत्री मोदी एवँ उनके विश्वसनीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसे लोग आरबीआई और नॉर्थ ब्लॉक की नीतियों में हस्तक्षेप ना करें।

वित्तीय दुनिया प्रधानमंत्री मोदी एवँ वित्त मंत्री अरुण जेटली से यह आश्वासन चाहती है कि वे रुपये एवँ अर्थव्यवस्था को स्वस्थ बनाने और सट्टेबाज गुट से बचाने के लिए सक्रिय होंगे।

रुपया स्‍वभावत: शक्तिशाली

सरकारी निष्क्रियता का सही उदाहरण सह-स्थान घोटाला है। सेबी, सीबीआई और ईडी द्वारा पर्याप्त अनुवर्तन ना होने के कारण लगता है कि राष्ट्रीय स्टॉक एक्सचेंज में सह-स्थान घोटाला करने वाले बिना किसी सार्थक दंड के बच जाएंगे। इस घोटाले से जुड़े 20 पूर्व अधिकारियों पर मुकदमा चलाने का अंंतिम दिन 20 सितंबर है अब तक इसके लिए हरी झंडी नहीं दिखाई गयी है। मुख्य खिलाड़ी अब भी अपने पदों पर हैं, जबकि कई अधिकारियों के नाम आरोप-पत्र में दाखिल हो गए हैं। इनकी सार्वजनिक स्थिति, जो इनके संबंधों एवँ रूचि को देखते हुए आश्चर्यजनक नहीं है, कमजोर रुपये के पक्ष में हैं।

परंतु, वास्तविकता यह है कि रुपया स्‍वभावत: शक्तिशाली है और बचाने के लिए नीतियों में थोड़े बदलाव ही काफी है ना कि डॉलर को खर्च करना। बाजार में यह आश्वासन दिलाने की आवश्यकता है कि भारत सरकार झुकने के बजाय रुपये का स्थिर एवँ सही मूल्य प्राप्त करने के लिए काम करेगी। जहाँ तक सह-स्थान का मामला है, तो रिपोर्ट कहते हैं कि कुछ दलालों एवं एक्सचेंज के बीच इंटरनेट कनेक्शन अब भी बना हुआ है परंतु जाँच एजेंसी इन शिकायतों पर गौर करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रही हैं, किस वजह से, यह नहीं पता। परंतु यह शायद कुछ वर्षो बाद उजागर होगा जब सेबी, सीबीआई और ईडी की निष्क्रियता पर शिकायतें दर्ज होंगी। पूर्व राजनेता के नेतृत्व में एक पूर्णतः वित्त पोषित एवँ प्रभावशाली गुट द्वारा बाजार के हस्तकौशल के चलते निष्क्रियता इसके बावजूद कि यह राजनेता कौन है और इसके कारनामे भी एजेंसी जानती है। यह व्यक्ति और इसके सहभागी जवाबदेही से परे लगते हैं।

लघु विक्रेताओं के खिलाफ कार्यवाही

व्युत्पन्न बाजार, जिसे पूरी छूट दी गई है इसके बावजूद कि ऐसा करना जोखिम भरा है, वास्तविक बाजार से आकार में बड़ा है, और गुट यह चाहते हैं कि विश्वस्तर पर रुपये को लेकर जाए जिससे उसके मूल्य में लगातार गिरावट हो। इससे 2019 के लोकसभा चुनाव के नज़दीक आते ही अर्थव्यवस्था संकट में होगी। दीर्घ में, कोई कारण नहीं की स्थिति ऐसी ही हो, खासतौर पर अब जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एवँ प्रधानमंत्री मोदी के दलों के बीच अच्छे संबंध है और चीन के साथ भी झी जिनपिंग एवँ मोदी के वुहान शिखर सम्मेलन में हुए खुशमिज़ाजी के बाद।

वे अधिकारी जो चाहते हैं कि नियामक व्यवस्था की सफाई की जाए उनका कहना है कि रुपये के लघु विक्रेताओं को पहचाना और उनके खिलाफ कार्यवाही करना और साथ ही अंतरराष्ट्रीय सट्टेबाज वित्तीय संस्थाओं को चेतावनी देना कि यदि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय रुपये को हानि पहुंचाने का प्रयास करेंगे तो भारत में उनके काम पर रोक लगाई जाएगी, यह दोनों ही आसान है। कुल मिलाकर भारत की अर्थव्यवस्था स्वस्थ है और सुधर रही है। अर्थव्यवस्था को उन लोगों से बचाने के लिए नीतियाँ बनाने की जरूरत है जो जल्द से जल्द पैसे कमाना चाहते हैं एवँ वे जो भारत के विकास को रोकना चाहते हैं। वित्तीय दुनिया प्रधानमंत्री मोदी एवँ वित्त मंत्री अरुण जेटली से यह आश्वासन चाहती है कि वे रुपये एवँ अर्थव्यवस्था को स्वस्थ बनाने और सट्टेबाज गुट, जो काफी समय से व्यवस्था को तोड़कर हर वर्ष कई बिलियन डॉलर का मुनाफा कमाते हैं, से बचाने के लिए सक्रिय होंगे।

ध्यान दें:

1. यहां व्यक्त विचार लेखक के हैं और पी गुरुस के विचारों का जरूरी प्रतिनिधित्व या प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

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