शीर्ष न्यायालय – केवल आपराधिक मामला दर्ज हो जाने से अधिकारों को नहीं छीना जा सकता!

    सुप्रीम कोर्ट में प्रमोद सिंह किरार की तरफ से दलील दी गई कि साल 2013 में कांस्टेबल भर्ती में उनका चयन हुआ था।

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    केवल आपराधिक मामला दर्ज हो जाने से अधिकारों को नहीं छीना जा सकता!
    केवल आपराधिक मामला दर्ज हो जाने से अधिकारों को नहीं छीना जा सकता!

    शीर्ष न्यायालय ने मध्यप्रदेश के एक मामले में कांस्टेबल भर्ती के एक उम्मीदवार की नियुक्ति का निर्देश दिया

    शीर्ष न्यायालय ने अपने एक अहम आदेश में कहा कि किसी शख्स के खिलाफ किसी अपराध का केस दर्ज होने पर ही उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है। शीर्ष न्यायालय ने मध्यप्रदेश के एक कांस्टेबल भर्ती के उम्मीदवार की अर्जी पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर उम्मीदवार किसी आपराधिक मामले से बरी हो गया तो केवल इसलिए नौकरी में नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उस पर मुकदमा चलाया गया था।

    शीर्ष न्यायालय ने मध्यप्रदेश के एक मामले में कांस्टेबल भर्ती के एक उम्मीदवार ऐसे उम्मीदवार की नियुक्ति का निर्देश दिया, जिसकी उम्मीदवारी इस आधार पर खारिज कर दी गई थी कि उसे हाईकोर्ट से मामले में राहत नहीं मिली थी। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल किया था। सुप्रीम कोर्ट में प्रमोद सिंह किरार की तरफ से दलील दी गई कि साल 2013 में कांस्टेबल भर्ती में उनका चयन हुआ था। लेकिन 2001 में दर्ज दहेज उत्पीड़न के मामले के आधार पर उनकी पात्रता खारिज कर दी गई थी। जबकि जबकि 2006 में ही वे समझौते के आधार पर इस मामले से बरी हो गए थे।

    गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों से लगातार आम जनता के अधिकारों की रक्षा की जरूरत को दिशा देने का काम किया है। इसी तरफ एक और कदम चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने उठाया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के परिसर में विकलांग लोगों को होने वाली समस्याओं का एक ऑडिट एक्सपर्ट्स की मदद से कराने का फैसला किया है। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के एक जज की अध्यक्षता में एक कमेटी का भी गठन किया गया है। इस कमेटी को सवालों की एक लिस्ट तैयार करके सुप्रीम कोर्ट के वकीलों, मुवक्किलों और प्रशिक्षुओं से भी फीडबैक लेने का काम सौंपा गया है।

    [आईएएनएस इनपुट के साथ]

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