शिक्षा का निजीकरण – सरकारों की विफलता और निकम्मेपन की कहानी

ऐसा नहीं है कि सरकारी शैक्षणिक संस्थानों को दुरुस्त करना सरकारों के बस में नहीं!

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शिक्षा का निजीकरण - सरकारों की विफलता और निकम्मेपन की कहानी
शिक्षा का निजीकरण - सरकारों की विफलता और निकम्मेपन की कहानी

ऐसा मान लेना कि सरकारी शैक्षणिक संस्थानों का अब कुछ नहीं हो सकता या निजीकरण ही सबसे अच्छा विचार है तो ये सरकारों के नाकारा होने का जीताजागता सबूत है।

ऋतिक रोशन की ‘सुपर 30’ रिलीज़ हो चुकी है और अच्छा कमा भी रही है। इस फिल्म ने एक बहस को नए सिरेसे जन्म दिया है जहाँ एक तरफ ‘शिक्षा का अधिकार’ है और दूसरी तरफ ‘शिक्षा का व्यापार’ है।

आज देश में सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के हालात ऐसे हैं कि यदि कोई मध्यम वर्गीय परिवार के बच्चे का भी सरकारी स्कूल में दाख़िला करवाया जाता है तो परिवार को रिश्तेदारों के बीच मुँह नीचा दिखाने जैसी नौबत आ जाती है। वहीं कोई सरकारी अफसर, नेता या किसी व्यापारी का बेटा/बेटी सरकारी स्कूल में दाख़िला लेतो दूसरे ही दिन वह बड़े-बड़े अख़बारों के कॉलम बन जाते हैं।

आज सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की बदहाली का आलम कुछ यूँ है कि जब निजी संस्थानों में एडमिशन के लिए कोई चारा न बचे तो लोगों को मजबूरन सरकारी शैक्षणिक संस्थानों की ओर रुख करना पड़ता है।

 “भारत समेत दुनिया के कई विकासशील देशों में निजीकरण के कारण समाज का गरीब एवं वंचित तबका शिक्षा से दूर होता जा रहा है और यह मानवाधिकार का सरासर उल्लंघन है।”

इसमें लोगों का कोई दोष नहीं! आज़ादी के बाद से हमारी सरकारोंने जिस प्रकार से निजीकरण(शिक्षाकेव्यापार) पर ज्यादा विश्वास किया है, यह उसी का परिणाम है।

अख़बारों में पढ़ा जा रहा है कि केंद्र सरकार नई शिक्षानीति का मसौदा तैयार करवा चुकी है। शिक्षा का अधिकार क़ानून (आरटीई) को लागू हुए भी करीब 9 साल पूरे हो चुके हैं लेकिन सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में विश्वास की बहाली को लेकर अभी तक कुछ ठोस सुनने नहीं मिला है।

यही कारण है कि ‘शिक्षाकाअधिकार’ अब ‘शिक्षाकेव्यापार’ की तरफ बढ़रहा है!

बात कुछ ऐसी है कि सरकारें अब सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को ठीक करने की अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटते हुए निजी संस्थानों को अधिक से अधिक कण्ट्रोल करने के उपायों की ओर बढ़ रही हैं। आपने सुना होगा, ‘निजी स्कूलों की मनमानी फीस’ के सामने किस तरह राज्यसरकारें दो-दो हाथ करने के मूड में हैं। कुछ राज्यों में तो सरकारें जीत भी चुकी हैं लेकिन हालात वही के वही हैं। निजी शैक्षणिक संस्थान ‘यहाँ से नहीं तो वहां से’ जैसे नीतियों से उतनी ही फीस वसूल रहे हैं और उसमे बढ़ोतरी भी कर रहे हैं।

आज़ादी के बाद से केंद्र में और राज्यों में विविध पार्टियों की, विविध नेताओं की सरकारों का आना-जाना लगा रहा है लेकिन शैक्षणिक संस्थानों में निजीकरण को प्राथमिकता देने का रवैया अभी तक वही है। दिनबदिन सरकारी स्कूलों एवं सरकारी कॉलेजों के घटते रुतबे को बहाल करने की कोई सख्त व्यवस्था सामने नहीं आई है।

जहाँ एक तरफ केंद्र सरकार ने देश के बाकी राज्यों में भी ‘गुजरात के विकास मॉडल’ की तर्ज पर विकास के बीज बोना शुरू कर दिए हैं वहाँ दूसरी तरफ गुजरात में ही सरकारी शैक्षणिक संस्थानों के सामने निजी संस्थानों को प्राथमिकता देना किस ओर इशारा कर रहा है, हम समझ सकते हैं।

मंगलवार, 16 जुलाई 2019 को गुजरात विधानसभा में विपक्ष द्वारा पूछे गए एक सवाल पर गुजरात के शिक्षामंत्री भूपेंद्रसिंह चूड़ासमा ने जानकारी देते हुए बताया कि पिछले दो वर्षों में 122 सरकारी, 13 ग्रांटेड एवं 1287 निजी प्राथमिक स्कूलों को अनुमति दी गई है वहीं 40 निजी कॉलेजों के सामने मात्र 1 सरकारी कॉलेज को अनुमति नसीब हुई है।

मौजूदा आंकड़ों को समझा जाए तो 1 सरकारी स्कूल के सामने 10 निजी स्कूलों को अनुमति मिली है। दूसरी तरफ, निजी कॉलेजों के सामने सरकारी कॉलेज की तो तुलना करना ही बेकार है। वर्तमान तस्वीर से यह समझना आसान है कि राज्य में किस कदर शिक्षा का निजीकरण हो रहा है।

एक तरफ राज्य सरकार ‘स्कूल फ़ीस नियंत्रण विधेयक’ के बूते निजी स्कूलों के सामने भौंहें दिखारही हैं वहीं दूसरी तरफ, अनुमति के मामले में निजी स्कूलों को अधिक प्राथमिकता देना, सरकार की मंशा पर गहरे सवाल खड़े करता है।

राज्य में सरकारी कॉलेजों के हालात तो सरकारी शिक्षाव्यवस्था को ध्वस्त करने जैसे ही प्रतीत हो रहे हैं। राज्य में आर्ट्स, कॉमर्स और विज्ञान के माध्यमों की कुल कॉलेजों में 455 निजी एवं 309 ग्रांटेड कॉलेज हैं जिसके सामने सरकारी कॉलेजों का आंकड़ा मात्र 100 है।

शिक्षा में निजीकरण की बात सिर्फ एक राज्य, एक नेता या एक पार्टी तक ही सीमित नहीं है। 2016 में ‘एजुकेशन इंटरनेशनल’ ने हैदराबाद पर केंद्रित अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि आंध्र प्रदेश सरकार जहां निजीकरण को बढ़ावा दे रही है, वहीं तेलंगाना सरकार ने 4000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए हैं। इस रिपोर्ट को देखते हुए दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री व शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि “शिक्षा में व्यावसायीकरण को रोकपाना संभव नहीं है।”

मनीष सिसोदिया ने दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था पर भी बात करते हुए कहा था कि “निजी स्कूलों में बेहतर माहौल दिया जाता है। यही कारण है कि आज सरकारी स्कूल कहीं न कहीं निजी स्कूलों से पिछड़ रहे हैं। निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना स्टेटस सिंबल बन गया है। हमें यह मानसिकता बदलनी होगी।” उन्होंने आगे जोड़ा कि “मेरा बेटा खुद निजी स्कूल में पढ़ता है, लेकिन हम अपनी लकीर बड़ी करने में जुटे हैं।”

2017 में राजस्थान सरकारने असंतोषजनक रूप से चलनेवाले 300 सरकारी स्कूलों को निजी हाथों में सौंप देने की घोषणा की थी।
लम्बे अरसे तक कम्युनिस्ट शासन का गढ़ रहे पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में भी निजीकरण के खिलाफ छात्रों और अभिभावकों के प्रदर्शन अब नई बात नहीं रही है।

देश में ‘शिक्षा के निजीकरण’ के माहौल पर बात करते हुए 2015 में संयुक्त राष्ट्र के विशेष शिक्षादूत किशोर सिंह ने कहा था कि “भारत समेत दुनिया के कई विकासशील देशों में निजीकरण के कारण समाज का गरीब एवं वंचित तबका शिक्षा से दूर होता जा रहा है और यह मानवाधिकार का सरासर उल्लंघन है।”

खैर, ऐसा नहीं है कि सरकारी शैक्षणिक संस्थानों को दुरुस्त करना सरकारों के बस में नहीं! छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले की सरकारी पाठशाला रामानुजगंज जिले के सभी निजी स्कूलों को मात भी दे रही है। यहां बच्चों को पढ़ाने के लिए अभिभावकों में होड़ सी मची है।

गुजरात की ही बात करूँ तो, वडोदरा के नज़दीक नरसिंहपुरा गांव में जिला पंचायत द्वारा चलाए जा रहे ‘धोरीवगा प्राथमिकस्कूल’ में शिक्षा का स्तर इतना अच्छा माना जाता है कि निजी स्कूलों से बच्चों के नाम कटवा कर मां-बाप यहां ऐडमिशन करवा रहे हैं। पिछले वर्ष दर्जनों अभिभावकों ने क्षेत्र के इंग्लिश मीडियम स्कूलों से अपने बच्चों के नाम कटवाकर यहां ऐडमिशन करवाएथे।

तो ऐसा मान लेना कि सरकारी शैक्षणिक संस्थानों का अब कुछ नहीं हो सकता या निजीकरण ही सबसे अच्छा विचार है तो ये सरकारों के नाकारा होने का जीताजागता सबूत है।

ध्यान दें:
1. यहां व्यक्त विचार लेखक के हैं और पी गुरुस के विचारों का जरूरी प्रतिनिधित्व या प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।

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