जम्मू-कश्मीर : चिदंबरम की तीन बड़ी गलतियाँ!

वास्तव में, धारा 370 और 371, तीरुमनी की निर्दयी हत्या और संघर्ष विराम पर उसके विचार उतने ही चौंका देने वाले है जितने हास्यास्पद और अद्भुत है।

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चिदम्बरम की तीन बड़ी गलतियाँ!
चिदम्बरम की तीन बड़ी गलतियाँ!

पी चिदंबरम ने धारा 370 एवँ धारा 370 से 370 (आई) को अपने लेख में एक बताया, ये तीन में से पहली गलती है।

कांग्रेस नेता एवँ पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम का जम्मू-कश्मीर पर नवीनतम लेख, जिसका शीर्षक है “गलियारे के पार: भारत जम्मू-कश्मीर परीक्षा में विफल हो रहा है (इंडियन एक्सप्रेस, मई 13), को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह इसके बावजूद के उन्होनें सीमा पर स्थित राज्य जम्मू-कश्मीर पर अपना मत काफी बार स्पष्ट किया है। वह 1953 के पूर्व के राजनीतिक एवँ संवैधानिक स्थिति के पक्ष में है जिसके तेहत दिल्ली को जम्मू कश्मीर पर तीन ही विषयों पर क्षेत्राधिकार था – रक्षा, विदेशी कार्य एवँ संचार – और अन्य सारे मुद्दे कश्मीर के मुस्लिम नेतृत्व के हाथों में दी गई। वे सशस्त्र बल (विशेष शक्ति) अधिनियम (अफस्पा) का कड़वा आलोचक हैं। यह अधिनियम सेना, जो जम्मू कश्मीर में जवाबी कार्रवाई में लिप्त है, को कानूनी उन्मुक्ति देता है। वे ये भी चाहता हैं कि मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार से सारे संबंध इस वजह से तोड़ दें कि सरकार की कश्मीर नीति आक्रामक है।

तीरुमनी को पथभ्रष्ट युवाओं ने नहीं मारा; खतरनाक पत्थरबाजों ने उसकी हत्या कर दी।

चिदंबरम ने अक्टूबर 15, 2009 को श्रीनगर में गृह मंत्री के हैसियत से क्या कहा था वो अब भी इतना ताज़ा है कि भूलना कठिन है। उन्होंने कहा था कि : “कश्मीर की भौगोलिक स्थिति एवँ उसका इतिहास अद्वितीय है। हमें ऐसा उपाय ढूंढना होगा जो अनूठा हो। सारे प्रयास तब शांत होंगे, जब तक समस्या के लिए राजनीतिक उपाय की आकृती नहीं मिलती। यह प्रक्रिया को आगे ले जाने के लिए आवश्यक है। एक बार राजनीतिक उपाय की आकृती पर पहुंचते ही, उसे उपयुक्त समय पर प्रचलित किया जायेगा” (इंडियन एक्सप्रेस, ऑक्टोबर 16, 2009)। उन्होंने यह बयान ऑल इंडिया एडिटर्स कॉन्फ्रेंस ऑन सोशल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर इशूज में भाषण देते समय दिया।

पी चिदंबरम ने अपने लेख “भारत जम्मू कश्मीर परीक्षा में विफल हो रहा है” में जम्मू कश्मीर और उसे क्या राजनितिक स्थान दिया जाना चाहिए इस पर क्या कहा? “धारा 370 (अक्टूबर 19, 1949) एक ऐतिहासिक समझौता था भारतीय संघ (भारतीय प्रभुत्व पढ़ें क्योंकि भारत 26 जनवरी, 1950 को ही गणराज्य बना) और रियासत जम्मू कश्मीर के शासक (महाराजा हरि सिंह) के बीच। चिदम्बरम ने आगे कहा – ये एक राज्य से सम्बंधित केवल एक ही खास प्रावधान नहीं है। धारा 371 और धारा 371 (1) जैसे प्रावधान भी हैं”,।

पी चिदंबरम, जो एक शीर्ष के वकील भी हैं, ने धारा 370 को भारत सरकार और महाराजा हरि सिंह के बीच समझौता बताकर ना केवल अपने आप को निरावरण किया अपितु धारा 370 को 371 से जोड़कर अपने बौद्धिक दिवालियापन को भी उजागर किया।

(धारा 370 भारतीय संविधान के तैयारी के समय अस्थाई प्रावधान के रूप में धारा 306-A के नाम से अक्टूबर 26, 1947 के परिग्रहण के दो साल बाद अक्टूबर 19, 1949 जोड़ा गया। महाराज हरि सिंह ने जिस विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए वह 560 अन्य रियासतों ने जिस पर हस्ताक्षर किए उन से मेल खाता है। इनमें कोई भी फर्क नहीं था क्योंकि इसे भारतीय सरकार के गृह मंत्रालय के राज्य विभाग ने बनाया था।)

धारा 370 और धारा 371 की तुलना नहीं की जा सकती। धारा 371, धारा 370 के विपरीत, किसी भी राज्य को संघ के भीतर विशेष दर्जा और अवशिष्ट शक्तियां नहीं प्रदान करता। ना ही वह किसी राज्य को अलग संविधान और अलग झंडा रखने का अधिकार देता है।

धारा 371 भारत के राष्ट्रपति को विदर्भ और मराठवाडा (महाराष्ट्र) एवँ सौराष्ट्र और कच्छ (गुजरात) के लिए अलग विकास मण्डल की रचना करने का अधिकार देता है। धारा 371-A में नागा समुदाय के धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं और उनके प्रथागत कानूनों की रक्षा करता है और नागालैंड विधायिका को ये अधिकार देता है कि वे भूमि के प्रभुत्व एवँ हस्तांतरण और उसके साधन से जुड़े केंद्रीय कानूनों को अपनाए या नहीं। यह नागालैंड के राज्यपाल को नागालैंड राज्य के कानून व्यवस्था की विशेष जिम्मेदारी देता है।

धारा 371-बी में आसाम के आदिवासी इलाकों से चुने हुए विधायक जिसमें निहित हो ऐसे समिति के गठन एवँ चलन और मणिपुर के लिए भी ऐसे ही समिति, जिसमें उस राज्य के विधायक हो, के गठन के लिए प्रावधान है।

धारा 371-सी राज्यपाल से राष्ट्रपति को मणिपुर के इलाकों से संबंधित रिपोर्ट भेजने की मांग करता है। धारा 371-डी राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वे राज्य (आंध्र प्रदेश) के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों के लिए समान अवसर और सुविधाएं उपलब्ध कराएं।

धारा 371-ई संसद को आंध्र प्रदेश में विश्वविद्यालय स्थापित करने का अधिकार देता है।

धारा 371-एफ संसद को सिक्किम के विभिन्न जाति के लोगों के अधिकारों एवँ हितों की रक्षा, उन जातियों के लोगों के लिए सीटें आरक्षित करके, करने का अधिकार देता है। यह धारा ये भी कहती है कि सिक्किम के राज्यपाल को राज्य में शांति और सिक्किम के विभिन्न जाति के लोगों के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए समान व्यवस्था बनाने का विशेष उत्तरदायित्व है।

धारा 371-जी में कहा गया है कि मिज़ो धार्मिक या सामाजिक प्रथाओं, मिज़ो प्रथागत कानूनों और प्रथाओं, सिविल और आपराधिक न्याय मिज़ो प्रथागत कानूनों को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए जाएंगे एवँ स्वामित्व और भूमि के हस्तांतरण के विषय में संसद का कोई भी अधिनियम लागू नहीं होगा जब तक मिज़ोरम का विधान सभा प्रस्ताव द्वारा मान्यता नहीं देता।

धारा 371-एच राज्यपाल को अरुणाचल प्रदेश में कानून व्यवस्था से सम्बंधित विशेष उत्तरदायित्व देता है और इस उत्तरदायित्व को निभाने के संदर्भ में यह कहा गया है कि “राज्यपाल, मंत्रिमंडल से आलोचना करने के पश्चात, व्यक्तिगत निर्णय के आधार पर कार्यवाही करे”।

धारा 371-आई में कहा गया है “इस (भारत के) संविधान के किसी भी धारा में कही बातों के होते हुए भी, “राज्य की विधानसभा में कम से कम 30 सदस्य होंगे”।

इस प्रकार धारा 371, धारा 370 के विपरीत, देश के उपेक्षित वर्गों और उपेक्षित एवँ अविकसित क्षेत्रों के लिए लाभदायक है। यह धारा कुछ राज्यों के राज्यपालों को विशेष अधिकार एवँ उत्तरदायित्व देता है और उन्हें व्यक्तिगत निर्णय के आधार कार्यवाही करने के अधिकार प्रदान करता है। वास्तव में, धारा 370 लोगों को बांटता है और विभाजित प्रवृत्तियों को बड़ावा देता है और धारा 371 लोगों को जोड़ता एवं सशक्त बनाता है।

पी चिदंबरम ने धारा 370 एवँ धारा 370 से 370 (आई) को अपने लेख में एक बताया, ये तीन में से पहली गलती है। अन्य दो गलतियाँ है (1) चेन्नई के राजावेल तीरुमनी, 22, “की मौत कुछ पथभ्रष्ट युवाओं के पत्थरबाजी से हुई” और (2) “जम्मू कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर (श्रीनगर में 9 मई को) केंद्रीय सरकार को संघर्ष विराम की घोषणा करने की मांग की”।

तीरुमनी को पथभ्रष्ट युवाओं ने नहीं मारा; खतरनाक पत्थरबाजों ने उसकी हत्या कर दी। इंडियन एक्सप्रेस के एक लेख में इस घटना पर क्या कहा था? उसमें कहा था :”उसके चेहरे का बायां ओर पूर्णतः तोड़ दिया गया था; जबड़ा, दांत और नाक टूटे हुए थे। उसके मृत शरीर के नीचे खून की विशाल जमाव था”। तीरुमनी के हत्या को पथभ्रष्ट युवाओं का कांड बताना केवल जले पर नमक छिड़कना और पत्थरबाजी जैसी घिनौने हरकत को बड़ावा देना होगा। वास्तव में तीरुमनी और केरल से अन्य पर्यटकों पर एवँ कर्नाटक के दो न्यायाधीशों पर 7 दिन के अंदर हुए आक्रमण एक गहरी साजिश का हिस्सा है जिससे भारतीयों को ये संदेश भेजा जा रहा है कि कश्मीर आप के लिए प्रवेश निषेध क्षेत्र है।

वास्तव में, धारा 370 और 371, तीरुमनी की निर्दयी हत्या और संघर्ष विराम पर उसके विचार उतने ही चौंका देने वाले है जितने हास्यास्पद और अद्भुत है

पी चिदंबरम ने कहा कि जम्मू कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर केंद्रीय सरकार को संघर्ष विराम की घोषणा करने की मांग की। यह तथ्यात्मक तौर पर गलत था। केवल एक कश्मीरी विधायक, इंजीनियर राशिद, जो केवल भारत के विरोध में बोलने एवँ हल्ला मचाने के लिए जाना जाते हैं, ने संघर्ष विराम का मुद्दा श्रीनगर में मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के अध्यक्षता में हुए 4 घंटे के सर्व दल सम्मेलन में उठाया और इस मुद्दे पर कोई चर्चा हुई ही नहीं।

भाजपा एवँ भाजपा के नेता और नवीन नियुक्त उप-मुख्यमंत्री कविंद्र गुप्ता ने मुख्यमंत्री के झूठ का पर्दाफाश 24 घण्टों के अंदर कर दिया। भाजपा ने पत्रकार सम्मेलन में यह स्पष्ट किया कि इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं हुई और भाजपा ऐसे खतरे से भरे सुजाव के खिलाफ है।

“भाजपा ऐसे संघर्ष विराम का विरोध करती है – एक सुझाव जिस पर सर्व दल सम्मेलन में चर्चा नहीं की गई। यह प्रस्ताव आम सहमति के लिए रखा ही नहीं गया था। सेना ने आतंकवादियों पर दबाव बनाया हुआ है और यह समय है उनके हाथ को और सशक्त बनाने का। यह संघर्ष विराम का जगह या वक़्त नहीं है”, सुनील सेठी, भाजपा के मुख्य प्रवक्ता ने जम्मू में पार्टी के तरफ से सफाई दी (थी ट्रिब्यून, मई 11)।

सिर्फ भाजपा और उप-मुख्यमंत्री कविंद्र गुप्ता ने सफाई दी, परंतु मुख्य विपक्षी दल नेशनल कांफ्रेंस और सीपीआई-एम ने भी मुख्यमंत्री का पर्दाफाश किया और कहा “संघर्ष विराम के मुद्दे पर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पत्रकारों को घोषित करने से पहले कोई आम सहमति नहीं थी”। नॅशनल कॉन्फरन्स के व्यवस्थापक चौधरी रमजान और कश्मीर से सीपीआई-एम के कुलगम से एक मात्र विधायक मोहम्मद युसूफ तरीगामी ने मुख्यमंत्री के दावे को खारिज कर दिया। जम्मू कश्मीर सरकार के प्रवक्ता, वरिष्ठ पीडीपी नेता और महबूबा मुफ्ती सरकार में मंत्री, नईम अख्तर ने जो कहा वह कमाल का और हास्यास्पद है। अख्तर ने कहा कि : “यह मुद्दा मुलाकात के दौरान उठाया गया… और तो और, मुख्यमंत्री को यह अधिकार है कि वह जानता के भावनाओं को दिशा दे” (ग्रेटर कश्मीर, मई 12)।

यहाँ याद दिला दें कि महबूबा मुफ्ती ने सर्व दल सम्मेलन के बाद पत्रकार सम्मेलन में दावा किया था कि रमज़ान और अमरनाथ यात्रा के महीने में संघर्ष विराम होना चाहिए इस पर सहमति हुई थी।” सब ने सहमति जताई कि केंद्रीय सरकार से संघर्ष विराम की मांग करनी चाहिए जैसे वाजपेयी जी ने 2000 में किया था। मुठभेड़ों और छापेमारी से आम आदमी परेशान हैं। ऐसा वातावरण बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए जिससे ईद और अमरनाथ यात्रा के दौरान शांति बनी रहे” महबूबा ने कहा था (इंडियन एक्सप्रेस, मई 10)।

इस से स्पष्ट होता है कि पी चिदंबरम की कश्मीर नीति देश के हित में नहीं है। वास्तव में, धारा 370 और 371, तीरुमनी की निर्दयी हत्या और संघर्ष विराम पर उसके विचार उतने ही चौंका देने वाले है जितने हास्यास्पद और अद्भुत है।

ध्यान दें:

यहां व्यक्त विचार लेखक के हैं और पी गुरूस के विचारों का जरूरी प्रतिनिधित्व या प्रतिबिंबित नहीं करते हैं

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