नालंदा के सरकारी उर्दू स्कूल में फहराया पीएफआई का झंडा

सामने आई तस्वीरों में दिख रहा है कि कुछ लोग जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, एसडीपीआई के लाल-हरे रंग के झंडे के नीचे खड़े होकर उसे सलामी दे रहे हैं।

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नालंदा के सरकारी उर्दू स्कूल में फहराया पीएफआई का झंडा
नालंदा के सरकारी उर्दू स्कूल में फहराया पीएफआई का झंडा

पीएफआई का झंडा एक सरकारी स्कूल में!

नालंदा के एक सरकारी उर्दू स्कूल में पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) के राजनीतिक संगठन सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) का झंडा फहराया गया। इसकी तस्वीरें सोमवार को सामने आई हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि झंडा फहराया कब गया है? प्रशासन ने अब मामले की जांच कर कार्रवाई किए जाने की बात कही है।

मामला सोहसराय थाना इलाके के उर्दू प्राथमिक विद्यालय, सोहडीह का है। सामने आई तस्वीरों में दिख रहा है कि कुछ लोग जिनमें बच्चे भी शामिल हैं, एसडीपीआई के लाल-हरे रंग के झंडे के नीचे खड़े होकर उसे सलामी दे रहे हैं। कुछ युवकों ने एसडीपीआई लिखा लाल-हरे रंग का पट्टा भी गले में पहन रखा है। नीचे जमीन पर भी झंडे की आकृति बनी है। एसडीपीआई लिखा है और फूल गिरे हैं। इससे पता चल रहा है कि झंडे को ठीक उसी तरह फहराया गया है, जैसे आम तौर पर तिरंगा फहराया जाता है।

मामला सामने आने के बाद आज मीडिया ने बिहार शरीफ के SDM कुमार अनुराग से बात की। उन्होंने कहा कि जिस तरह स्कूल परिसर में एसडीपीआई का झंडा फहराया गया है, यह खुलेआम कानून का उल्लंघन है। फोटो किस महीने की है, इसकी जांच की जा रही है। जो भी लोग इसमें शामिल हैं, फोटो से पहचान कर उन पर कार्रवाई की जाएगी।

उन्होंने कहा कि विद्यालय प्रशासन को इस मामले की जानकारी है या नहीं, उनसे भी इस संबंध में पूछा जाएगा। इसमें अगर स्कूल का रोल मिला तो उनके ऊपर भी कार्रवाई की जाएगी।

जुलाई में पटना पुलिस की कार्रवाई के बाद फुलवारी शरीफ से पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से जुड़े लोग पकड़े गए थे। इन पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगे। एसडीपीआई इसी पीएफआई का राजनीतिक संगठन है। जांच एजेंसियों ने इन दोनों संगठनों से जुड़े लोगों पर देशविरोधी और आतंकी कामों में शामिल होने के आरोपों पर कार्रवाई की है।

पटना पुलिस ने देश के खिलाफ साजिश रचने के आरोप में चार संदिग्धों को गिरफ्तार किया है। ये हैं अतहर परवेज, मो. जलालुद्दीन, अरमान मलिक और एडवोकेट नूरुद्दीन जंगी। पुलिस के मुताबिक ये चारों ही पीएफआई से जुड़े हैं।

पीएफआई बिहार में साल 2016 से सक्रिय है। पूर्णिया जिले में संगठन ने हेडक्वार्टर स्थापित करने की तैयारियां की थीं। इसके अलावा राज्य के 15 से अधिक जिले में ट्रेनिंग सेंटर भी चलाए हैं।
पटना में गिरफ्तारियों के बाद अब जांच NIA कर रही है। NIA ने पीएफआई का नेटवर्क तलाशने के लिए बिहार के कई शहरों में छापेमारी भी की है।

पटना में जांच से जुड़े अधिकारियों ने भास्कर को बताया है कि पीएफआई अनपढ़, बेरोजगार मुस्लिम युवाओं को टारगेट करके अपने साथ जोड़ रहा है। पुलिस जांच में सामने आया है कि युवाओं को हथियार चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई है।

पीएफआई के तार विदेशों से जुड़े होने और बाहर से फंडिंग की भी जांच की जा रही है। पुलिस को पीएफआई के अकाउंट में 90 लाख रुपए मिले हैं।

अतहर ने पुलिस को बताया था कि उसने 26 लोगों को ट्रेनिंग दी थी। इन सभी के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। सभी पापुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) से भी जुड़े थे।

बाबरी ध्वंस से जुड़ी हैं जड़ें: पीएफआई की जड़ें 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए खड़े हुए आंदोलनों से जुड़ती हैं। 1994 में केरल में मुसलमानों ने नेशनल डेवलपमेंट फंड (NDF) की स्थापना की थी। स्थापना के बाद से ही NDF ने केरल में अपनी जड़ें मजबूत कीं और इसकी लोकप्रियता बढ़ती गई और इस संगठन की सांप्रदायिक गतिविधियों में संलिप्तता भी सामने आती गई।

कोझिकोड़ हत्याकांड में मेंबर अरेस्ट हुए: साल 2003 में कोझिकोड के मराड बीच पर 8 हिंदुओं की हत्या में NDF के कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए। इस घटना के बाद BJP ने NDF के ISI से संबंध होने के आरोप लगाए, जिन्हें साबित नहीं किया जा सका।

NDF-KDF-MNP मिलकर बना पीएफआई: केरल के अलावा दक्षिण भारतीय राज्यों, तमिलनाडु और कर्नाटक में भी मुसलमानों के लिए काम कर रहे संगठन सक्रिय थे। कर्नाटक में कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी यानी KFD और तमिलनाडु में मनिथा नीति पसाराई (MNP) नाम के संगठन जमीनी स्तर पर मुसलमानों के लिए काम कर रहे थे।

इन संगठनों का भी हिंसक गतिविधियों में नाम आता रहा था। नवंबर 2006 में दिल्ली में हुई एक बैठक के बाद NDF और ये संगठन एक होकर पीएफआई बन गए। इस तरह साल 2007 में पीएफआई अस्तित्व में आया और आज 20 राज्यों में ये संगठन काम कर रहा है।

2009 में पॉलिटिकल और स्टूडेंट विंग बना: अब पीएफआई एक संगठित नेटवर्क है जिसकी देश के बीस से अधिक राज्यों में मौजूदगी है। पीएफआई की एक राष्ट्रीय समिति होती है और राज्यों की अलग समितियां होती हैं। ग्राउंड लेवल पर इसके वर्कर होते हैं। समिति के सदस्य हर तीन साल में होने वाले चुनाव से चुने जाते हैं। 2009 में पीएफआई ने अपने राजनीतिक दल एसडीपीआई और छात्र संगठन सीएफआई (कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया) का गठन किया था।

जैसे-जैसे पीएफआई का प्रभाव बढ़ा, कई राज्यों के अन्य संगठन भी पीएफआई के साथ जुड़ते चले गए। गोवा का सिटीजन फोरम, पश्चिम बंगाल का नागरिक अधिकार सुरक्षा समिति, आंध्र प्रदेश का एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस और राजस्थान का कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशन सोसायटी– ये सभी संगठन पीएफआई का हिस्सा हो गए।

पीएफआई का मुख्यालय दिल्ली में, बेस दक्षिण: देश भर में आधार बनाने के बाद पीएफआई ने अपना मुख्यालय भी कोझिकोड से दिल्ली स्थानांतरित कर लिया। अब पीएफआई देश के अधिकतर हिस्सों में सक्रिय है, लेकिन इसका मजबूत आधार दक्षिण भारत में ही है। हाल ही में जब कर्नाटक में हिजाब विवाद हुआ तो कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया और पीएफआई ने अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए उसका जमकर इस्तेमाल किया।

हिजाब विवाद में भी पीएफआई का रोल: मैंगलोर, उडुपी, मंड्या और बेंगलुरु में इस संवाददाता को पीएफआई और सीएफआई का प्रभाव स्पष्ट नजर आया। हिजाब के लिए आंदोलन कर रहीं छात्राएं और मंड्या में नारेबाजी के बाद चर्चित हुई छात्रा ने पीएफआई से अनुमति मिलने के बाद ही मीडिया से बात की थी।

[आईएएनएस इनपुट के साथ]

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